जनादेश में छिपे संदेशों को काश ! विपक्षी दल समझें !

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prabhat jha
      सन् 2019 लोकसभा चुनाव के जनादेश का सभी राजनैतिक दलों को गहरा अध्ययन करना चाहिए। मुझे विश्वास है कि वे ऐसा कर भी रहे होंगे। अभी तक जो हमने विश्लेषण किया है, उसमे राजनैतिक दलों के लिए अनेक सन्देश छिपे है, उसे क्रमशः रखने  का प्रयास कर रहा हूं। इस जनादेश में इतिहास रचा है। ‘इतिहास’ घटता है न कि घटाया जाता है। अवसर तो भारत में बहुत बड़े बड़े नेताओं और राजनैतिक दलों को मिला, पर प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते अमित शाह ने सहमति और समन्वय का इतिहास रचा है। यह वर्तमान राजनीति में आद्वितीय घटना है। इस सन्देश के पीछे इस ‘समन्वय’ की बहुत बड़ी भूमिका है।
      नेता जो सोचता है, संगठन उसे पूरा करने में लग जाए और संगठन जो सोचे उसे नेता पूरा करने में लग जाए यह सामान्य बात नहीं है। भाजपा को छोड़कर देश में अभी ऐसा राजनैतिक दल कोई नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने असंभव को संभव कर दिखाया है। इस जनादेश में जो सबसे बड़ा सन्देश है, वह यह है कि नेता को अपने अध्यक्ष यानी संगठन पर और संगठन को अपने नेता पर अटूट विश्वास होना चाहिए। जबकि आज की राजनीति में होता यह है कि ‘नेता’ सरकार पर ही नहीं संगठन को भी चलाने लगता है और संगठन नेता को हटाने में लग जाता है। आज भारतीय राजनीति के शीर्ष नेतृत्व में इस स्तर पर ऐसे ही सात्विक विश्वास की आवश्यकता लगती है। कमोवेश इस धुरी पर विपक्षी दल अपने को देखंगे तो बहुत ही कमजोर पाएंगे।
      इस जनादेश में कुछ महत्वपूर्ण सन्देश और भी है जैसे भारत के जनविवेक को जातीय आधार पर देखना।  जनतंत्र के 73 वर्ष हो गए।  अब जनता परिपक्व हो गई है। उसके जन विवेक को जात से जोड़कर अपना गुलाम या मजबूरी समझना हमारी नादानी हो सकती है, समझदारी नहीं। ‘जातीय’ मिथक तोड़ने का यह प्रयास निरंतर जारी रहना चाहिए। सब समाज को लिए साथ में बढ़ते जाना सिर्फ गीत नहीं है, इस भावना को संगठन में साकार करना चाहिए।
      इस जनादेश में सन्देश है की ”दल से बड़ा देश” है।  इस विचार से हटकर अन्य राजनैतिक दलों की स्थिति यह है कि सबसे पहले स्वयं फिर दल और उसके बाद देश।  अधिकतर राजनैतिक दल तो सिर्फ परिवार चलाने के लिए पार्टी चलाते है। इस जनादेश ने साफतौर पर सन्देश दिया है कि अपवाद स्वरुप  परिवारवाद या वंशवाद ठीक है, पर इसी भाव पर आधारित राजनैतिक दलों को जनता ने धराशाही कर दिया।  इस चुनाव में ऐसा कई जगह देखने को मिला।
      जनादेश 2019 में एक और बड़ा सन्देश है की यदि आप जनप्रतिनिधि है तो आप पर जनता का हक़ है। आपको न्यूज़ चैनलों की तरह ‘चौबीस  घंटे’ दिखना पडेगा। चैनलों को तो दिखना पड़ता है, पर अब राजनैतिक तौर पर निर्वाचित जनप्रतिनिधि को दिखने के साथ-साथ काम भी करते रहना होगा।
      इस जनादेश में एक और सन्देश कि आप विरोध के लिए विरोध न करें।  विरोध सार्थक – समर्थ और तथ्यों के साथ साथ जनता के विवेक को स्वीकार भी होना चाहिए।  अनर्गल आरोपों से नेता और उसके राजनैतिक दल का ही बुरा हश्र होता है। पुलवामा के बाद बालाकोट की घटना को देश ने सराहा, पर विपक्षी दलों ने मजाक उड़ाया। विपक्ष की इसको लेकर बड़ी आलोचना हुई । भारतीय राजनीति में मतभेद सदैव रहेंगे, पर उसकी मर्यादाएं और मानदंड को कभी नहीं भूलना चाहिए।
      एक और महत्वपूर्ण सन्देश है इस जनादेश में।  इसे सभी राजनैतिक दलों को खासकर विरोधी दलों को समझना चाहिए।  जैसे देश में होते हुए विकास और दिखते हुए काम की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।  विपक्षी दलों ने आंखे होते हुए भी इन मसलों पर अंधे होने का प्रमाण दिया।  आप दो आंखों से जनता को देखना चाहते हो, पर आप यह भूल जाते हो कि जनता हजारों आंखों से आपके हर कार्य  को देखती है।अतः विरोध विचारों का होना चाहिए न की देश में हो रहे विकास का।  विपक्षी दल विकास का विरोध करती रही अतः उनका स्वयं का विकास रुक गया और साथ ही उनकी सोच भी थम गयी।
जनादेश में सन्देश यह भी है कि धर्म निरपेक्षता के नाम पर अब मतदाता को, आम नागरिक को गुमराह नहीं किया जा सकता |
    इस जनादेश में एक बहुत ही गहरा सन्देश है, जिसे सभी दलों को गौर से समझना चाहिए।  आज भारतीय राजनीति में नए लोगों को दल से जोड़ना।  पीढ़ियों में परिवर्तन।  अनुभव और ऊर्जा का समन्वय।  प्रतिमा की रक्षा और अमर्यादितों को पलायन पर मजबूर करना । आज भाजपा को छोड़कर किसी राजनैतिक दल ने इस तरह का साहस नहीं दिखाया।
      सन् 2019 के जनादेश में जो सबसे महत्वपूर्ण सन्देश दिया है, कि देश उसे पसंद करता है जो देश हित  में साहसिक निर्णय लेते हैं न कि केवल दल हित में।  मोदी सरकार के साहस को लोगों ने वोट की नजरों से नहीं देखा।  देश ने मोदी सरकार के साहसिक निर्णयों को देश हित में देखा। जबकि सभी विपक्षी दलों ने उन साहसी निर्णयों को वोटों की नजरों से देखा।   अब यहां  समझ में आता है कि जिस साहसिक निर्णय को जनता ख़ुशी से स्वीकार करती है, उस निर्णय के विरुद्ध विपक्षी दल विरोध जताकर क्या जनता के मन के विरुद्ध नहीं जा रहे ? यह बाट तो स्पष्ट हो गयी है की जनता साहसिक निर्णय वाली सरकार चाहती है । इस जनादेश में सन्देश तो बहुत है पर एक अंतिम और महत्वपूर्ण सन्देश है कि संविधान संसद, सरहद और सुरक्षाके साथ-साथ उपलब्ध लोगों में देश किनके हाथों में सुरक्षित है।  इन अहम् मसलों पर लोग जब विचार करते हैं तो  उनकी आंखों से सभी नेताओं के चेहरे चलचित्र की तरह सामने आते है। ऐसा होने पर लोग उसी की ओर जिन पर उनका अटूट विश्वास होता है।  जन- जन का विश्वास जीतने के लिए विश्वास पूर्ण कार्य भी करना पड़ता है। नरेंद्र मोदी इस मसले पर सबसे अव्वल रहे। उन्हें इसका दोहरा ईनाम मिला। एक यह की उनपर जनता में अटूट विश्वास था और अमित शाह ने उस अटूट जनविश्वास को जन-जन तक बड़ी ताकत से संगठन के माध्यम से घर घर ले गए।
      इस जनादेश का मेरी नजरों में एक महत्वपूर्ण सन्देश जिसे मै मानता हूं, वह यह है कि अपने दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं को सम्मान देना। दल का श्रृंगार होता है दल का कार्यकर्ता। जिस दल को उनके कार्यकताओं का विश्वास नहीं वह दल जनता में कैसे विश्वास हांसिल कर सकता है। आज भारतीय राजनीति और राजनैतिक दलों में इसकी महती आवश्यकता होनी चाहिए। कार्यकर्ता राजनैतिक दलों और जनता के बीच सेतु का कार्य करता है।
      इस जनादेश में सन्देश तो बहुत है क्रमश ! राजनैतिक दल ईमानदारी से समझने का प्रयत्न कर लें ।
           प्रभात झा
सांसद एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
     भारतीय जनता पार्टी
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।