होली है..

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sandeep srajan
सियासत की शतरंज से बाहर निकलकर
बादशाह , वजीर और प्यादे
सब एक ही अंदाज में नज़र आए
तो समझ लेना होली है ।
पड़ोसी घुरता है इस बात की शिकायत
जो दिन रात करती है
वही पड़ोसन जब चिढ़ाती हुई गुजर जाए
तो समझ लेना होली है
सरहदों पर गूंज हो जब बम गोलो की
और चैन से देश सोया हो
बंदूकों की गोलियॉ ले रूप पिचकारी का
तो समझ लेना होली है
आतंक और विद्रोह के बादल
लगे छटने जहान से
नफरत की दुनिया में मुहब्बत की गूंज हो
तो समझ लेना होली है
रंग बदले नज़र आए, ढ़ग बदले नज़र आए ,
रहे बस दोस्ती जग में ,दुश्मनी को है बिसराए
प्रेम की गाथा लिखी जब जाए
तो समझ लेना होली है
जगत राधा लगे सारा, कृष्ण मय जो रहा अब तक
बजे जब वंशी के स्वर तो,बहे बस प्रेम रस धारा
हरि भी देख जग रूप विस्मित हो
तो समझ लेना होली है ।
#संदीप सृजन
उज्जैन
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matruadmin

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Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।