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arpan jain

समाज से चलने वाले और समाज को चलाने वाले तत्वों का जिक्र करना बिना साहित्य और पत्रकारिता के अधूरा ही माना जाएगा। साहित्य और पत्रकारिता दोनों ही समाज के अंग और संवेदनशील सदस्य है। वस्तुतः दोनों ही समाज के दर्पण है- अन्तर केवल दोनों के कार्यव्यवहार और शैली का है। एक अदद पत्रकार और साहित्यकार दोनों ही समाज के महत्वपूर्ण मुद्दों पर व्यवस्था से प्रश्न करते है,समाज को जागरूक करते है। इसीलिए साहित्य एवं पत्रकारिता को पूरक माना जाता हैं। पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण कार्य तथ्यों एवं विचारों को प्रकाशित करना है और साहित्य का भावों तथा विचारों को अभिव्यक्ति देना। साहित्य को विस्तार देने का कार्य भी पत्रकारिता द्वारा किया जाता है और साहित्यिक पत्रकारिता, पत्रकारिता का ही एक रूप है।

स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भारतीय पत्रकारिता का आरम्भ हुआ जिसमें प्रसिद्ध साहित्यकारों ने ही पत्रकारिता को जिम्मेदार बनाया जबकि यूरोप में इसी दौर में पत्रकारिता केवल मनोरंजन का साधन मात्र थी, तभी भारत में पत्रकारिता अपने नए स्वरुप यानी देश को आज़ाद करने की दिशा में युवा हो रही थी। इस पत्रकारिता के पुरोधाओं का जब जिक्र होता है तो उनमें शामिल हस्ताक्षरों का हिन्दी साहित्य में दखल ही नहीं बल्कि सक्रिय और सतत उन्नयनकारी अनुदान है। साहित्य और पत्रकारिता दोनों ही समाज से प्रभावित भी है और समाज को प्रभावित भी करते है।

वैसे तो देखा जाए तो साहित्य संवेदना, रचनात्मकता, कल्पनाशीलता से उपजता है, दूसरी ओर पत्रकारिता तथ्यों पर आधारित है। सन् 1980 तक साहित्यकार के लिए पत्रकारिता में अनुकूल स्थिति थी, 1986 में पत्रकारिता फीचर से हट कर तथ्यात्मक हो गयी। सन् 1990 में तो परिदृश्य पूरी तरह से बदल गया। किन्तु गहरे तालमेल के चलते साहित्य पत्रकारिता का उभरता स्वरुप भी इसी कालखंड में प्रशस्त हुआ। साहित्य और पत्रकारिता दोनों में लोकमंगल ही निहित है, इसी के कारण दोनों विधाओं में सामंजस्य बैठ जाता है। और इसी से उपजी साहित्यिकी पत्रकारिता की आवश्यकता भी है और यह बड़ी जिम्मेदारी का कार्य भी है।

हिन्दी के गद्य साहित्य और नवीन एवं मीलिक गद्य-विधाओं का उदय ही हिन्दी पत्रकारिता की सर्जनात्मक कोख से हुआ था। यह पत्रकारिता ही आरंभकालीन हिन्दी समाचार पत्रों के पृष्ठों पर धीरे-धीरे उभरने वाली अर्ध-साहित्यिक पत्रकारिता से क्रमश: विकसित होते हुए, भारतेन्दु युग में साहित्यिक पत्रकारिता के रूप में प्रस्फुटित हुई थी। भारतेन्दु हरिशचन्द्र (सन्1850-1885 ई.) की पत्रिकाओं कविवचनसुधा (1867ई.), हरिशन्द्र मैगज़ीन (1873ई.) और हरिशचन्द्र चंद्रिका (1874ई.) से ही हमें वास्तविक अर्थों में हिन्दी की वैचारिक साहित्यिक पत्रकारिता के दर्शन प्राप्त होते हैं। हिन्दी की आरंभकालीन साहित्यिक पत्रकारिता से ही हिन्दी गद्य का चलता हुआ रूप निखर कर सामने आया और भारतेन्दु युग से गद्य-विधाओं और गद्य साहित्य की अखंड परंपरा का अबाध आविर्भाव हुआ।

द्विवेदी युग (1900-1918 ई.) में कई साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हुई। वर्ष 1900 में इलाहबाद से मासिक पत्रिका सरस्वती का प्रकाशन शुरू हुआ। वर्ष 1903 में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के संपादन में इस पत्रिका ने नई ऊंचाइयों को छुआ। साहित्य के क्षेत्र में द्विवेदी जी ने व्याकरण एवं खड़ी बोली को एक नई दिशा प्रदान की। इस समय की अन्य पत्रिकाएं सुदर्शन, देवनागर, मनोरंजन, इन्दु समालोचक आदि थी।

छायावाद काल में चांद, माधुरी, प्रभा साहित्य, संदेश, विशाल भारत, सुधा, कल्याण, हंस, आदर्श, मौजी, समन्वय, सरोज आदि साहित्यिक पत्रिकाएं सामने आई। वर्तमान में सारिका, संचेतना, निहारिका, वीणा, प्रगतिशील समाज, युगदाह, कथासागर, सन्देश, आलोचना, सरस्वती संवाद, नया ज्ञानोदय, हंस, संस्मय, हिन्दीग्राम आदि साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं।

स्वाधीनता के पश्चात आजकल, अनुवाद, अकविता, आलोचना, इन्द्रप्रस्थ भारती, समकालीन भारतीय साहित्य, गगलाचल, कृति, भाषा, साहित्य अमृत, नटरंग, संचेतना, नंदन, बाल भारती, सार-संसार, साप्ताहिक हिन्दोस्थान, हंस, कथादेश, नया प्रतीक, समीक्षा आदि साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रहीं हैं।

सेंट फॉक्स साहित्यिक पत्रकारिता के आरंभ का बड़ा दिलचस्प विवरण देते हुए बताते हैं कि रेनाडो नामक पेरिस के एक डॉक्टर अपने अस्पताल के रोगियों के मन-बहलाव के लिए अद्भुत घटनाओं, रोचक किस्सों, अलौकिक विवरणों और दिलचस्प खबरों को जमा करके बीमारों को पढ़ने देने लगे। डॉ रेनाडो का विश्वास था कि ऐसे मनोरंजन से रोगियों को शांत और प्रसन्न रखा जा सकता है और उन्हें शीघ्र निरोग भी किया जा सकता है। कहना न होगा कि उन्हें इसमें आशातीत सफलता भी मिली। इससे उत्साहित होकर, पेरिस प्रशासन की अनुमति से, रेनाडो ने 1632 ई. से ऐसी सामग्री संकलित कर एक नियमित साप्ताहिक पत्रिका शुरु कर दी, जो आम लोगों में भी खासी लोकप्रिय हो गई। रेनाडो के अनुकरण पर पेरिस से ही सांसद डेनिस द” सैलो ने 1650ई. में ”जर्नल द” सैवेंत्रास“ नामक एक साहित्यिक पत्र आरंभ किया। आइज़क डिज़रेज़ी के मतानुसार साहित्य और समालोचना की यही सबसे पहली पत्रिका है। ऐसी ही दूसरी पत्रिका 1684 में बेल ने निकाली इसका नाम “वावेत्स द“ ला रिपब्लिक द” लेटर्स“ था।

जितना समृद्धशाली इतिहास रहा साहित्य पत्रकारिता का उसका वर्तमान आज उतना ही अवनति की मुड़ता नजर आ रहा है। वर्तमान दौर में डिजिटल युगीन पत्रकारिता में समाज के सर्वहारा वर्ग की चिंता गौण होते जा रही है और पत्रकारिता ने टकसाल की तरफ रुख कर लिया है यानि विज्ञापनवादी संस्कृति का

पल्लवन और पोषण करती पत्रकारिता आज समाज और साहित्य से दूर होती जा रही है। न अख़बारों में जनता के धरने-प्रदर्शन है, न ही साहित्यिक आयोजन। न तो समदर्शी साहित्य लिखा जा रहा है जो प्रेरणा प्रदान करें न ही वो प्रकाशित हो रहा है। इस अवनति के जिम्मेदार साहित्यकार और पत्रकार तो है ही पर उतने ही जिम्मेदार समाजजन भी है जो सवाल नहीं करते अख़बार संस्थान से।

साहित्य पत्रकारिता में दक्षता और विशेषज्ञता की महती आवश्यकता है , धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाओं की आवश्यकता तो है ही साथ में धर्मवीर भारती, जैनेन्द्र, मुंशी प्रेमचंद और दादा विष्णु पराड़कर जैसे पत्रकारों की भी जरुरत है।

समाज में होने वाले साहित्यिक आयोजनों के समाचारों के प्रकाशन की जरुरत है, इसी के साथ प्रेरणा देने वाले साहित्य को भी स्थान देने की आवश्यकता है। साहित्य पत्रकारों की दक्षता की भी जरुरत है। क्योंकि सिक्के के दो पहलुओं की तरह पत्रकार और समाचार दोनों ही आवश्यक है। समाज में गोष्ठी, परिचर्चा, काव्य चर्चा आदि आयोजनों के लगातार होने की भी आवश्यकता है तो उनके प्रचार-प्रसार की भी।

साहित्य पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों को अध्ययन की आवश्यकता है, जिनकी दिनचर्या का कुछ समय पुस्तकालय में बीतने चाहिए जिससे नए विषयों में पारंगतता के साथ-साथ सम्पूर्ण सन्दर्भ उल्लेखित करने से वजन बढ़ जाता है। और यह वजन निश्चिततौर पर अध्ययन से ही हासिल होता है।

इसलिए साहित्य और पत्रकारिता को जिम्मेदारी के साथ अपने पक्ष का निर्वहन करना होगा तभी भारत की साहित्यिक धरा पर सांस्कृतिक चेतना का बीच पुनः प्रस्फुटित होगा और समाज एकजुट हो कर सांस्कृतिक समन्वय की ओर बढ़ेगा।

#डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’

परिचय : डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर  साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।

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