आखिर कब तक…….!

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pradeep upadhyay

आखिर कब तक किसान आत्महत्या करता रहेगा ! कहीं तो यह सिलसिला थमना चाहिए लेकिन नहीं!किसान आत्महत्या करना बन्द नहीं करेगा क्योंकि जबसे सरकारें चाहे वह किसी भी दल की रही हों,किसान हितैषी होती जा रही हैं, किसान आत्महत्या कर अपनी बात उन तक पहुँचा कर सरकारों को अपनी ओर आकर्षित करते चले आ रहे हैं।शायद ज्यादा लाड़-प्यार में आदमी पगला जाता है

कहने वाले कहते हैं कि जब सरकार का ध्यान किसानों की तरफ नहीं था तब वे आत्महत्या नहीं करते थे,भगवान के दरबार में धरना दे कर बैठ जाया करते थे।किसान कर्ज में ही जन्म लेता था और कर्ज में ही राम नाम सत्य हो जाता था लेकिन कभी आत्महत्या का ख्याल तक अपने दिमाग में घर नहीं करने देता था, ठीक उसी तरह जैसे पहले सास-बहू इकठ्ठा रहकर झगड़ा भी करतीं किन्तु बहुएँ कभी आत्महत्या करने जैसा कदम नहीं उठाती थीं लेकिन अब लोग कहने लगे हैं कि जबसे सरकार बहुओं की हितैषी हुई और सास से बैर भाव पाल लिया है,बहुएँ भी आत्महत्या करने लग गई ।यानी जहाँ इन ऊपर वाले का हाथ और साथ मिला नहीं कि ये लोग गलत राह की ओर चल पड़े।यह तो गलत बात है ना !हाँ,यह बात जरूर विचारणीय है कि पहले की तरह घूट-घूट कर मरना ठीक है या फिर आत्महत्या कर मौत से आलींगन करना !

बहरहाल, बात किसानों की ही कर रहा हूँ।पहले किसानों के खेत-खलिहान रीते ही रह जाते थे,अब खाद-बीज,पानी के साथ बिजली का भी इंतजाम किन्तु फिर भी संतोष नहीं।कर्ज पर ब्याज नहीं, तब भी खुद की जान के दुश्मन!चलो अब तो कर्ज माफ़ी भी लेकिन नहीं जी…उन्हें अपनी जिन्दगी से मोह फिर भी नहीं हो पा रहा है, विस्मित हूँ।

ऐसे में देश के ह्रदय प्रदेश की सरकार के एक मंत्री जी के बयान की चारों ओर प्रशंसा की जा रही है।उनका कहना भी सही है कि जो किसान साठ साल की उम्र पूरी कर चुके हैं और काम करने लायक नहीं रह पाए हैं, उनकी तम्बाकू खाने और बीड़ी पीने की लत के लिए उनका मोड़ा(बेटा) तो पैसा देगा नहीं और इसीलिए सरकार ने यह व्यवस्था की है कि साठ साल के बुजुर्ग को बीड़ी पीने और तम्बाकू खाने के लिए एक हजार रुपये हर महीने पेंशन दी जाएगी।

वाह हुजूर! कितने किसान हितैषी हैं !तम्बाकू निषेध और नशा विरोधी अभियान जाए तेल लेने,आखिर किसान की तलब पूरी करना भी तो उनका कर्तव्य है।हाँ,यदि उन किसानों की दारू-शारू की लत का भी पहले ही पता लगाकर उसका भी कुछ इंतजाम हो जाए तो सोने में सुहागा।ऐसे में किसी को आत्महत्या करने का सुअवसर या यूं कहें कि गुंजाइश ही नहीं रहेगी।सरकार और यमराज की ट्रीटी से किसान की राह भी तो आसान हो जाएगी।

सरकारे आला को समय रहते इस बात पर भी विचार कर लेना चाहिए कि साठ साल का किसान ही क्यूँ ! हर आयु वर्ग के किसान के लिए अफीम खाने,बीड़ी पीने और तम्बाकू खाने की अनिवार्यता के साथ कुछ राजसहायता की बात हो जाए।हम कलमकार लोग इस पर लार नहीं टपकाएं तो ही बेहतर है क्योंकि कुछ लोग हमारे बारे में यह भी कहते सुने गए हैं कि काम के ना काज के दुश्मन अनाज के।!

डॉ प्रदीप उपाध्याय
देवास,म.प्र.

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।