कितना कुछ बदल सा रहा है

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sanjay

कितना कुछ बदल रहा है अब और न जाने आगे कितना कुछ और भी बदलेगा / संसार के सुख में और अपने सुख में बहुत कुछ अंतर होता है / संसार का सुख और दुःख तो प्रत्येक इंसान को भोगने को मिलता है यदि उसने इस संसार में मानव जन्म लिया है तो ये सब तो उसके जीवन में आने ही वाला है / भले ही वो कितना बड़ा दानी हो या भिकारी ही क्यों न हो / सभी को अपने कर्मो का फल इसी मनाव जीवन में भोगना पड़ता है / एसा हमारे पादित और अनेको ग्रंथो में इन सब बातो का वर्णन हमें मिलता है / हाँ हम उनकी रफतार को धर्म के सहारे थोडा कम कर सकते है / समाज में ज्ञानी और अज्ञानी दोनों लोगो की भीड़ लगी हुई है / सब की अपनी अपनी सीमाए है / और वो लोग अपने को धर्म के अन्दर रखते हुए अपना कर्म वो लोगो करते रहते है / समय कितना कुछ बदल सा रहा है / इस कलयुग में साथियों कोई भी किसी का नहीं है , सभी लोगो अपने अपने स्वार्थ में इतने ज्यादा फसे हुए है की उन्हें गलत और सही की भी पहचान नहीं है / और इस में समाज का बहुत ही बड़ा योगदान है / परन्तु आज कल की समाज भी मिडिया की तरह ही हाला मचने में बहुत ही माहिर है / और सरकर भी वर्षो से ये ही राजनीती है करती आ रही है / परन्तु आज एकाएक संजय की गाड़ी खड़ी थी / और ज्यादा तर लोगो एक दुसारे को देख कर उस गाड़ी में बैठकर उन्हें हम लोग छूडावा देते है और सभी लोगो की राय चाहते है / कितना कुछ हो गया है, की हम लोग आज भी वो वर्षो पुरानी वाली प्रथाओ के साथ भगवान को पूजाते और उनके दर्शनों का लुप्त उठा रहे है /
पहले तो रेप का एक दो ही केश पेपरों में शिकायत हो रही है / और देश की संस्कृति को बचानेव के लिए सभी जन इस कार्यो को सही दिशा में लेकर जा रहे है / इसीलिए तो आम इंसान अब कहने लगा है की जीए तो अब किस के लिए / क्योकि आज कल की समाज पर हम क्या एनी लोग भी विशवास नहीं करते है / हम सभी देशवासियों को इस आपात की स्थिति से निपात ने के लिए कुछ ठोस और कुछ कठिन सभी तरह के शब्द प्रश्न रूप में है / जिनको उठाकर हमें नीचा दिखाया है/ कितना कुछ हो रहा है और हम लोग वाही पर खड़े है जहाँ से सुबह चले थे / इस कलयुग में क्या साधू और क्या अत्याचारी , हत्यारे और भी बहुत कुछ रखा है / मुझे तो कही से नहीं लगा रहा है की हमारा देश बहुत ही महान / हाँ एक चीज में तो काफी नाम है हमारे देश का / जो हमें हमारे पूर्वजन विरासत में हमें छोड़ गाये है /

#संजय जैन

परिचय : संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं पर रहने वाले बीना (मध्यप्रदेश) के ही हैं। करीब 24 वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती हैं।ये अपनी लेखनी का जौहर कई मंचों  पर भी दिखा चुके हैं। इसी प्रतिभा से  कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा इन्हें  सम्मानित किया जा चुका है। मुम्बई के नवभारत टाईम्स में ब्लॉग भी लिखते हैं। मास्टर ऑफ़ कॉमर्स की  शैक्षणिक योग्यता रखने वाले संजय जैन कॊ लेख,कविताएं और गीत आदि लिखने का बहुत शौक है,जबकि लिखने-पढ़ने के ज़रिए सामाजिक गतिविधियों में भी हमेशा सक्रिय रहते हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।