एक सैनिक की पत्नी का संदेशा

sushil duggad

ऐ सावन की घटा जा सीमा पे ज़रा
एक  संदेशा उन तक पहुंचा देना ।
कई दिनों से नहीं लौट के आए वो,
घर के हाल जरा उन्हें बतला देना।
बहना  सजा  रही  है थाल फिर से,
सुनी  कलाई  का  मान बढ़ा देना ।
बह ना जाए नीर उसकी आंखों से,
अबके तो आके राखी बंधवा लेना।
बूढ़ी आँखों  में बरस रहा है सावन,
रटन  जुबां  पर  एक  ही रहती है ।
सावन  में आएगा वादा था बेटे का,
दिन भर बस राहें तकती रहती है ।
सूनी  गोदी  तरस रही है मय्या की,
आकर गोदी में वो सिर छिपा देना।
नहीं  भरोसा  अब  बूढ़ी सांसों का,
फिर से वो बुझती सांसे जगा देना।
फीकी पड़ने लगी मेहंदी हाथों की,
अब चूड़ियां भी कहां खनक रही ।
पायल  भी भूली है बजना अब तो,
नहीं सिंदूरी मांग में भी झलक रही
कहना एक संदेशा मेरा भी उनको,
आकर  हाथों  में मेहंदी रचा देना ।
बाजे पायल,  खनके चूड़ी फिर से,
अपने हाथों सूनी मांग सजा देना ।
कितने ही सावन रीते बीतें है देखों,
इतना तो उनको यह समझा देना ।
सूनी झोली तरस रही है ममता को,
अब के तो अंगना फूल खिला देना।
“स्पर्श” करूं मैं खुशियां सावन की,
झूले आकर के दो चार झूला देना ।
सावन  के झूले सजे सूने आंगन में,
अब  के सावन तो नहीं भुला देना ।
*सैनिक का संदेशा अपने परिवार को*
ऐ  सावन  की  घटा  सुन जरा तू,
मेरा  भी संदेशा घर पहुंचा देना ।
अब के सावन ना आऊंगा घर मैं,
घर वालों को इतना बतला देना ।
करना मां के चरणों में वंदन मेरा,
मां को  इतना  तू याद दिला देना,
गया था जब पहली बार सीमा पे,
तब बोली वो दूध नहीं लज़ा देना।
मां  मैं  तो तेरे चरणों का ऋणी हूं,
तेरे दूध का कर्ज चुकाने आया हूं।
जन्म लिया है जिस माटी पर मैंने,
मैं  उसका फर्ज निभाने आया हूं ।
कह देना बहना को भी ना रोए वो,
उसकी राखी का मैं मान बढ़ाऊँगा
देश  की बहनों का रखवाला हूं मैं,
हर घर – घर में राखी बंधवाऊँगा ।
देना  प्रियतमा को भी संदेशा मेरा,
मेहंदी  से  अपने  हाथ रचा लेना ।
नहीं  झुला पाऊंगा झूले सावन के,
इस बार जरा मन को बहला लेना।
घात  लगाए  बैठे दुश्मन सीमा पर,
मैं  कैसे  घर जाकर आराम करूँ ।
इस  वतन  का  रखवाला  हूं मैं तो,
सौ  जिंदगियां भी मैं कुर्बान करूं ।
प्रताप शिवा की सुन – सुन गाथाएं,
खून रगों में देशप्रेम का खोल रहा।
रोम  रोम में सरफरोशी का जज्बा,
कतरा  कतरा जय हिंद बोल रहा ।
बांध  कफन  मैं  निकला  हूं घर से,
अब नहीं पीछे ये कदम हटाऊंगा ।
कोई  उठे  बुरी  नजर वतन पर तो,
मैं  फिर यम से भी टकरा जाऊंगा।
मेरा  वतन रह सके अमन – चैन से,
अपने  हक की खुशियां लुटाऊंगा ।
स्पर्श करें ना कोई दुश्मन सीमा को,
मैं  यहीं पर सारे त्यौहार मनाऊंगा ।
रखना मुझको अपनी यादों में जिंदा
एकदिन जरूर लौटकर मैं आऊंगा।
मगर  आ  गया  काम  वतन  के तो,
कफन  तिरंगे का साथ मैं लाऊंगा ।
सुशील दुगड़ “स्पर्श”
अंकलेश्वर(लुहारिया)

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