क्या वर्गीकृत भारत, एक सच्चाई है?

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beni prasad

           भारत की विशालता एक समय में कितनी रही होगी और उस विशालता में समाहित हुआ भूगोल और भूगोल के साथ उससे जुड़ा सम्पूर्ण इतिहास, कितना और कैसा रहा होगा, इसका परिमाप सबके पास अलग-अलग है । मगर मैं इतना सा जानता हुँ की उस विशाल भारत में मेरा न तो कोई भूगोल था और न हीं कोई इतिहास । ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के नारे ने आज जितनी सुर्ख़ियाँ बटोरी हैं, क्या उस समय का विशाल भारत उसकी विशालता पर इतराकर ऐसे ही दम्भ भरता होगा, जैसे आज भरा जा रहा है अथवा उसे उसकी विशालता में वैसी ही लघुता का अहसास होता होगा जैसा आज मुझे तथाकथित ‘श्रेष्ठ’ भारत में अपने अस्तित्व का होता है । कई बार मैं समझ नहीं पाता, दिखावा उस समय था या दिखावा वर्तमान में हैं। मैं समझना चाहता हुँ कि उस भारत की विशालता के परिमाप क्या थे ? उस विशालता का आंकलन भौगोलिक था, ऐतिहासिक था अथवा सामाजिक या फिर आर्थिक ? और इन्हीं परिमापों से फिर मैं अपनी लघुता का परिमापन करूँगा कि मेरी लघुता, जो निरपेक्ष नहीं है, मेरे समकक्षों से भी लघु क्यों हैं?
           मैं जब-जब ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के नारे को सुनता हुँ, तब-तब मन अपने-आप में कचोटता है कि क्या भारत वास्तव में ‘एक’ हैं और क्या यह ‘श्रेष्ठ’ भी हैं? जीवन में अब तक जितने भी अनुभव हुए, अध्ययन से प्राप्त विश्लेषण हुआ , उनमें कहीं न कहीं हो सकता है ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का अर्थ मालूम न हुआ हो किन्तु इस विश्लेषण ने कम से कम ‘एक’  का अर्थ और ‘श्रेष्ठ’ होने के परिमापों से तो ज़रूर परिचित करा ही दिया हैं। इस परिचय ने अंदर ही अंदर यह महसूस करा दिया कि दिखावा, छलावा, दंभ, झूठी शान और अनगिनत भेद्भावाओं के साथ टुकड़ों में बँटे विशालकाय समुदाय को भी ‘एक’ का नारा देकर किस तरह बरगलाया जाता हैं और किस तरह विभिन्न वर्गों में व्याप्त वर्ग विभेद के होने वाले अहसास को आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से सशक्त वर्गों एवं समुदायों द्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया जाता हैं।
           आज वर्गीकृत भारत इतने टुकड़ों में बँट चुका हैं, जिनको जोड़ पाना अब नामुमकिन ही हैं। ये टुकड़े सामाजिक, आर्थिक अथवा राजनीतिक हों या फिर मानव समुदायों में फैलाये गए ऊँच-नीच के ज़हर से उत्पन्न हुए हों किन्तु अब भारत में मेरे लिए उस स्थिति का अनुमान लगा पाना असंभव ही हैं, जिसमें इन टुकड़ों को जोड़कर विभेद रेखा को अदृश्य करते हुए ‘एक’ भारत का निर्माण किया जा सके। तब यह प्रश्न उठना लाज़िमी ही हैं कि क्या भारत को अब आगे भी इसी तरह वर्गीकृत होकर रहना पड़ेगा अथवा ये प्रत्येक वर्ग अपने-आप को स्वतन्त्र और सम्माजनक स्थिति में देखने के लिए ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ जैसे नारों को दरकिनार करके अस्तित्व एवं अधिकारों के शीत संघर्ष को ग्रीष्म रूप देंगे।
सदियों से मौन बैठा समुदाय अत्याचारों में जकड़े हुए अब और इंतज़ार नहीं कर सकता । आख़िर कब तक एक शांत संघर्ष के दिखावे में पड़े रहकर परिणामों की बाट जोहते रहेंगे । जिस समाज ने प्रत्येक व्यक्ति को एक वर्ग में तब्दील कर दिया हो एवं अधिकारों और समता पर सदियों से जड़े तालों को तोड़ने पर रोक लगा रखी हो, उस समाज को स्वयं की श्रेष्ठता का दंभ भरने का कोई हक़ नहीं हैं । क्या अब ये मान लिया जाए की तथाकथित लचीला भारतीय समाज अपने-आप को बदल पाने में असमर्थ हो चुका हैं और यदि ऐसा हैं तो ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ जैसे नारे अपने आप में अप्रासंगिक हो जाते हैं। जो सिर्फ़ और सिर्फ़ समाज की अक्षम्य ख़ामियों को छिपाने हेतु परदों के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं।
आख़िर अब भी ऐसी स्थितियाँ क्यों हैं की हम भारतीय समाज में व्याप्त टुकड़ों की सच्चाई को खुलकर स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। क्या इस सच्चाई को उजागर न कर पाने के पीछे कुछ ख़ास समुदायों का रणनीतिक दबाव हैं अथवा शोषित वर्ग की आवाज़ में अभी भी वह तीव्रता पैदा नहीं हुई जो परिवर्तन को समाज के केंद्र बिंदु तक लाने में सक्षम हो सके और यदि हम सच्चाई को स्वीकार कर चुके हैं तो अब इंतज़ार करने का कोई ठोस कारण नहीं रह जाता।
न जाने कितनी पीढ़ियाँ इस अमानवीय भेदभाव के ज़हर को पीते हुए दम तोड़ चुकी हैं किन्तु अब आने वाली एक भी पीढ़ी इस बात के लिए क़तई तैयार नहीं होगी की वो भी अपने जीवन को अपने पूर्वजों की तरह इस दमघोंटू समाज में घुँट-घुँट कर मरने के लिए छोड़ दे। अब वर्तमान और आने वाली पीढ़ी अपने जीवन काल में परिवर्तन की प्रक्रिया में शामिल होने के साथ ही प्रत्यक्ष परिणाम भी देखना चाहेंगी, जिससे कम पर न तो किसी से समझौता किया जा सकता है और न हीं ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ जैसे झूठे नारों से मोहित होकर इंतज़ार की बेड़ियों में जकड़ा रहा जा सकता हैं। परिवर्तन ‘वांछित’ सदैव से था किन्तु इस पीढ़ी में ‘अनिवार्य’ हैं । उसके लिए संघर्ष का स्वरूप चाहे किसी भी प्रकार का हो, स्वीकार्य होगा।
परिचय:
नाम – बेनी प्रसाद राठोर
स्थान- बाराँ (राजस्थान)
शिक्षा- B.Sc. (गणित)
कार्यक्षेत्र- विध्यार्थी
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।