
युग सृजन की नव कड़ी को जोड़ती मैं,
कुप्रथा की बेड़ियों को तोड़ती मैं।
रश्मियों को मैं सदा आहूत करती,
रुख हवाओं का प्रभंजन मोड़ती मैंll
दीप को देकर सहारा दीप्त करती,
मैं सदा नव मल्लिका में ओज भरती।
आँधियाँ-तूफान मेरे हमसफर,
काल हो-कलिकाल हो,मैं नहीं डरतीll
हम अनल में पाँव रखकर चल चुके,
अहं मेरे सभी उसमें जल चुके।
कंटकों के बीच खिलते फूल हम,
ठोकरों से आज हम संभल चुकेll
#डॉ.मीना कौशल
परिचय : डॉ.मीना कौशल की जन्मतिथि २० जून १९८० और जन्मस्थान गोण्डा(उ.प्र.) हैl लेखन आपका शौक है।

