हिन्दी तिथि अनुसार मनाएं जन्मदिन

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namita dube

आज मुझे मित्र के पुत्र के जन्मदिन की पार्टी में जाने का अवसर मिला। जब मैं वहां पहुंची तो,पार्टी पूरे शबाब पर थी ,पाश्चात्य संगीत पर कुछ युवक-युवती थिरक रहे थे। थोड़ी देर में केक काटा गया,सभी अपनी मस्ती में मस्त थे,किन्तु बच्चे के दादा-दादीजी एक तरफ शांत मुद्रा में सभी परिचितों से मिल रहे थे। उन्हें देख मुझे लगा कि,कहीं उनके भी मन में बच्चे का प्रथम जन्मदिन इस तरह मनाने का मलाल रहा होगा,किन्तु अपने बच्चों की ख़ुशी के कारण वह भी पर कटे पंछी की तरह मूकदर्शक बन यह सब देख रहे थे।

पार्टी से लौटकर मन बहुत उद्वेलित थाI सचमुच आजकल जन्मदिन मध्य रात्रि में मनाना फैशन बन गया है,लेकिन क्या आप जानते हैं कि,अंग्रेजी तारीख पर जन्मदिन या वर्षगांठ  मनाना किसी के लिए भी शुभ नहीं होता है।

अंग्रेजियत हावी होने की वजह से लोग उसी दिन अपना जन्मदिन समझ बैठते हैं,जो अंग्रेजी कैलेंडर में मौजूद होती है,लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह कतई सही नहीं है। आजकल लोग इस बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते,लेकिन धार्मिक कार्यों में जरुरी और निश्चित प्रक्रिया क्या होती है,इस बात को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है। हमारा शरीर पञ्च तत्वों से निर्मित है,तथा इस ब्रम्हांड में स्थित ग्रह नक्षत्रों से निश्चित ही हमारा जीवन प्रभावित होता है। हमारा शरीर स्थूल देह एवं सूक्ष्म देह द्वारा निर्मित है। अंग्रेजी कैलेंडर से मनाए गए जन्मदिन पर केवल स्थूल देह ही प्रभावित होती है,जबकि हिन्दी  तिथि अनुसार मनाने पर लगभग ९५ प्रतिशत सूक्ष्म देह प्रभावित होती है। इतना ही नहीं,तिथि प्रारम्भ होते ही जातक को प्रत्येक क्षण उसकी सूक्ष्म देह के स्पंदनों से समदर्शी एवं देहशुद्धि के लिए आवश्यक सात्विक स्पंदन प्राप्त होता है। दिनभर हम ऊर्जावान बने रहते हैं। जन्मतिथि पर ब्रम्हांड में कार्यरत तरंगें जीव की प्रकृति और प्रवृत्ति के लिए पोषक होती है,इसलिए उस तिथि पर की गई सात्विक और चैतन्य कृतियाँ जीव के अंतर्मन पर गहरा संस्कार अंकित करने में सहायक होती हैं ,इसी कारण जीव के आगामी जीवन क्रम को आध्यात्मिक बल मिलता है,और जीवन में आने वाली बाधाओं के विरुद्ध संघर्ष करने की क्षमता प्राप्त होती है। इस दिन अपने बड़े-बुजुर्गों व परिवार के सदस्यों द्वारा मिले हुए आशीर्वाद सर्वाधिक फलित होते हैं,क्योंकि उस तिथि पर प्रवाहित होने वाली ऊर्जा तरंगें जातक के शरीर में मौजूद तरंगों से सर्वाधिक मेल खाती है।

पाश्चात्य में मोमबत्ती बुझाकर और केक काटकर जन्मदिन मनाया जाता है,जबकि भारतीय संस्कृति में बुझाने के बजाए दीपक जलाकर तथा केक काटने के बजाए कण-कण को जोड़कर बनाए गए एकता के शक्ति स्वरुप लड्डू खिलाकर जन्मदिन मनाया जाता है। मोमबत्ती या दीपक बुझाना हमारी संस्कृति में नकारात्मकता का प्रतीक है। यद्यपि मेरा यह मतलब नहीं है,कि पाश्चात्य संस्कृति ठीक नहीं है,किन्तु हमारी संस्कृति में जो वैज्ञानिक तथ्य निहित हैं,उसे भी नकारा नहीं जा सकता है,अतः हमारी संस्कृति लुप्त हो,उससे पहले ही हिन्दी तिथि अनुसार अपना जन्मदिवस मनाने हेतु हमें सभी को प्रेरित करना होगा। आज युवा पीढ़ी उनकी जन्मतिथि से अनभिज्ञ है,अतः हमें हमारी आध्यात्मिकता से युवा पीढ़ी को परिचित कराना जरुरी है।

                                                                                                     #नमिता दुबे

परिचयनमिता दुबे  इंदौर की निवासी हैंl आप शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं और रचनाएं-लेख लिखने का काफी पुराना शौक रखती हैंl अभी करीब एक वर्ष से अधिक सक्रिय हैं,क्योंकि पात्र-पत्रिकाओं में इनका सतत प्रकाशन हो रहा है I       

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।