मैंने गेहूँ के संग घुन पिसते देखा है,
सियासत में लाचार किसान को
मरते देखा है।
सीमा विवाद में वीर जवान को मरते देखा है।
मजहबी जंग में इंसानियत को
मरते देखा है।
जालिमों के बीच भोली जनता को फंसते देखा है।
आज न कहेंगे हम कौन दोषी हैं,
कौन देशप्रेमी और सरफ़रोशी है।
धरतीपुत्र न देखा ऐसा हमने,
विद्रोह को नहीं देता वो थमने।
आगजनी करे और करे हुड़दंगा,
जो भी आए सामने,करे उसे वो नंगा।
ये केसा मौत का कहर है,
जल रहा आज हरेक शहर है।
हमने सदियों से यही सीखा है,
दुश्मन पर भी हमने किया भरोसा है।
वो फरेब से बाज नहीं आते हैं,
लेकिन हर बार मुंह की खाते हैं।
भोला किसान इतना उग्र नहीं था,
चोरों के बहकावे में फंस गया था।
अर्जी बस अब यही है,
देशप्रेम हो,विनती बस यही है॥
#प्रमोद बाफना
परिचय :प्रमोद कुमार बाफना दुधालिया(झालावाड़ ,राजस्थान) में रहते हैं।आपकी रुचि कविता लेखन में है। वर्तमान में श्री महावीर जैन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय(बड़ौद) में हिन्दी अध्यापन का कार्य करते हैं। हाल ही में आपने कविता लेखन प्रारंभ किया है।