चलो चलें बाढ़ का मजा ले

देश में इन दिनों चहुंओर मानसूनी बारिश खूब बरस रही है। सालों बाद जरूरत के मुताबिक ऐसी बारिश देखने को मिली। हां बरखा से जन व जमीन को सुविधा और दुविधा साथ-साथ हो रही है। आलम कहीं सूखे से राहत तो कहीं बाढ़ की आफत तो कहीं फसल की खुशामत तीनोें हद की हिमाकत पर है। येही तो असली कुदरत का करिश्मा है। जिसे हम मानव अपनी होशियारी व हरकत से हुकूमत समझते आए हैं। नतीजतन पानी-पानी के लिए त्राहिमाम-त्राहिमाम होना हमारी फितरत बन गई है। बकौल गंदगियों से जिंदगियां तबाह, पावन सलिला आचमन होकर सूखे कंठ और जमीं को तृप्त नहीं कर पा रही है। बावजूद सबक लेना तो दूर उसके कारक भी मानव रूपी दानव बे-रोक टोक बनते जा रहे हैं। 

 ये भूलते हुए कि प्रकृति हमारी आने वाली पीढ़ी की अनमोल धरोहर है। उसे संजोए रखने के बजाए नेस्तनाबूत करने में प्राणपण से जुटे हुए हैं। इसीलिए प्रकृति भी अपना हिसाब समय-समय पर पूरा कर देती है। ऐसे में भी जल प्लावन, अतिवृष्टि और बाढ़ जैसी त्रासदी में हमारी मजे की चाहत हिलौरें मारती नहीं थकती। ऐसा ही मंजर हालिया घरों, सड़कों, नदी, नालों और तालाबों में आई विनाशकारी बाढ में दिखाई पढ़ा। जहां उमड़े जनसैलाब ने चलो, चलें बाढ़ का मजा ले कहने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। जैसे समुद्र का तट, झील की ठंड़क और वादियों का मनोहारी आबोहवा हो वैसे ही ललक से त्रासदी का मनचाहा लुत्फ उठाने में सिरमौर रहे। 

वीभत्स! विनाश पर तमाशबीनों ने गजब का तमाशा बनाया। बे-खबर राहगिरों, बीमार और जरूरतमंदों की आवाजाही में अड़ंगा लगाए रखा चाहे रास्ता जलमग्न ही क्यो ना हो? तथा मौके पर राहत में जुटा अमला और सुरक्षा कर्मी मुसीबत में फंसे त्रस्त को छोड़कर मजाकियां ग्रस्त को समझाते, झड़काते तथा हटाते रहने में मजबूर रहा। बावजूद नुक्ता-चिनी और नुराकुश्ति में मशगूल बेदरंगी अपना रौब झाड़ते हुए अपने यारों को दूरभाष यंत्र पर आंखों देखा हाल चित्र और चलचित्र दिखाकर बर्बादी का कहर देखने न्यौता देते रहे। बिना देर गंवाए यारी भी ऐसी निभी की पलक झपकते ही शागिर्दों का रैन बसैरा वाहनों का काफिला लेकर सड़कों पर धमाचौकड़ी मचाते रहा। और तबाही का हर सुख लेते तक टस से मस नहीं हुआ, जब तक पानी खतरे से नीचे नहीं आया।  बद्स्तुर यहां वक्त की दुहाई देते थकने नहीं वाले सरकारी नुमाइंदे, राजनैतिक आकाओं, डाक्टरों और व्यापार जगत के साहूकारों का जमघट बेखौफ, नफे नुकसान बैगर नाश को शान से देखता रहा। बरबस, तसल्ली से प्रफुल्लित मुद्रा में नाते-रिश्तेदारों को महाप्रलय की अजर-अमर खुशखबरी सुनाई। खातिरदारी में फुटकर चना, फल्ली, मक्का, चाय, पान और मंगोड़े इत्यादि बेचने वालों ने मौके का फायदा उठाकर मेहनत की कमाई कर ली।

काश! इतनी ही शिद्दत, दौलत और मेहनत आपदा व बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए कर दी जाती तो डूबते को तिनके का सहारा हो जाता। कई उजड़े घरों को परछाई, बीमार को दवाई, बच्चों को पढ़ाई, बेरोजगारों को कमाई, किसान को उपज की भरपाई और गरीबों की भलाई हो जाती। लेकिन चंद मुठ्ठी भर सेवादानों और सरकारी मोहकमों के अलावा किसी ने इनकी परवाह तक नहीं की। उलट छोड़ दिया हालातों पर अपने नयन सुख के निहारने के वास्ते मौजदारों ने। गफलतबाजी में कि इस विपदा के वाकई कोई गुनाहगार है तो हम है और हम ही है, जिसका परिणाम आज दूजे तो कल हमें भोगना है। 

  अलबत्ता, बचाव ही उपाय है यह मूल मंत्र हमें  प्रलयकारी मुसीबतों से बचा सकता है। इसके लिए हमें समय रहते कारगर कदम उठाने की जरूरत है। जो हम बेरुखी में सालों से दरकिनार करते आए हैं। प्रतिफलन सूखा, बाढ़ और भूस्खलन आदि दिक्कतें जन-जीवन तथा परि आवरण को आगोश में ले रही हैं। लिहाजा, अब बिना देर गंवाए अवैध उत्खनन-प्रदूषण रोकने, जल-जंगल-जमीन-पशुधन बचाने, वृक्ष बनाने, जैविक खेती को बढ़ावा, कांक्रिट के संजाल से मुक्ति और स्वच्छता के ईमानदारी से ठोस प्रयास करने पड़ेंगे। समेत हर घर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम, जल सोख पीड़, पेड़ का मनोपयोग और कमशकम जिला स्तर पर नदी-नाला-तालाबों को जोड़ने की परिकल्पना जल संरक्षण के निहितार्थ साकार करना होगा। तब ही सही मायनों में प्रकृति का विदोहन सजा की जगह मजा की सुखद अनुभूति देंगा। 

#हेमेन्द्र क्षीरसागर

पत्रकार, लेखक व विचारक

matruadmin

Next Post

हिंदी मेरी भाषा

Sun Sep 15 , 2019
हिंदी मेरी मातृभाषा , हिंदी मेरी जान ! हिंदी के हम कर्मयोगी , हिंदी मेरी पहचान , हिंदी मेरी जन्मभूमि , हिंदी हमारी मान , हम हिंदी कि सेवा करते है , हम जान उसी पे लुटाते है , हिंदी हमारी मातृभाषा , हिंदी हमारी जान ! है वतन हम […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।