सफरनामा

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swayambhu

जयपुर डायरी

भाग 3……

इस बार की जयपुर यात्रा के कई रंग हैं जिनमें विशेष रूप से पुष्कर और अजमेर शरीफ की यात्रा को अलग अलग कैनवास पर देखना जरूरी है…

15 जनवरी को आरंभ हुए ICETEAS के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का समापन 16 जनवरी की शाम को हो चुका था। देश विदेश के वैज्ञानिकों एवं शिक्षाविदों के बीच मुख्य अतिथि के रूप में सम्मान पाना निःसंदेह मेरे लिए गौरव की बात थी…
मेरी 18 की वापसी की फ्लाइट भी मौसम की खराबी को लेकर रद्द हो गई थी…लिहाजा 17 को #पुष्कर_भ्रमण के बाद मेरे पास पर्याप्त समय था
#अजमेर_शरीफ के लिए…

पुष्कर से निकलकर हम अरावली पर्वत श्रृंखला की चढ़ाई की ओर बढ़े…
पहाड़ी इलाकों का सफर बेहद रोमांचकारी होता है…घुमावदार सड़क पर गाड़ी भी हवाओं के साथ लहराती हुई चल रही थी..
यहां स्थित नाग पर्वत अजमेर और पुष्कर को अलग करता है… करीब 15 किलोमीटर आगे चलने पर हम अजमेर के मुक़द्दस दरगाह पर पहुंचे। करीब 800 साल पहले महान सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती ईरान से सैकड़ों मील का कठिन सफर तय करके यहां पहुंचे थे और इसी जगह को अपना इबादतगाह बना लिया था। फिर जो भी उनके पास आया उनका मुरीद होकर रह गया। उनके दर पर दीन-ओ-धर्म, अमीर-गरीब, बड़े-छोटे किसी का फर्क नहीं था। सब पर उनकी रहमत का नूर बराबरी से बरसा। तब से लेकर आज तक आठ सदियाँ गुजर गईं लेकिन राजा हो या रंक, हिन्दू हो या मुसलमान जो भी उसकी चौखट पर पहुंचा… खाली हाथ नहीं लौटा। उन्होंने हर मजहब के लोगों को आपसी प्रेम और मोहब्बत का संदेश दिया…उनकी मुरादें पूरी की…

उनकी दरगाह का बुलंद दरवाजा इस बात का गवाह है कि मुहम्मद-बिन-तुगलक, अल्लाउद्दीन खिलजी और मुगल बादशाह अकबर से लेकर बड़ा से बड़ा हुक्मरान भी यहां पर पूरे अदब के साथ सिर झुकाकर आया। यह दरवाजा इस बात का भी गवाह है कि ख्वाजा साहब सर्वधर्म सद्भाव की दुनिया में एक ऐसी मिसाल हैं जिसकी कोई सानी नहीं है।
ख्वाजा के पवित्र आस्ताने में राजा मानसिंह का लगाया चांदी का कटहरा और ब्रिटिश महारानी मेरी क्वीन का अकीदत के रूप में बनवाया गया वजू का हौज इसकी मिसाल है।

दुनिया भर में धर्म के नाम पर संघर्ष के बावजूद ख्वाजा की दरगाह में हिन्दू, जैन, सिख सभी तरह के विचार रखने वाले धर्म के अनुयायी समभाव से अपनी अकीदत का नजराना पेश करते हैं। विदेशी सैलानी भी यहां बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

हम दरगाह पर पहुंचे तब तक दोपहर का वक्त हो चला था। वहां मजार पर चादर और फूल चढ़ाने वालों का तांता लगा था। हम सब भी कतार में  आगे बढ़ते हुए उस मुक़द्दस स्थल तक पहुंचे और अपनी श्रद्धा के सुमन अर्पित किये।
हर सिद्ध स्थल दरअसल एक ऊर्जा केंद्र होता है। यहां आकर इस केंद्र की अदृश्य तरंगों को आसानी से महसूस किया जा सकता है।
मजार से बाहर एक झरोखे पर कई लोग मन्नत का धागा बांधते हुए भी नजर आये।

वापसी के समय बाहर निकलते हुए कुछ अपंग लोगों पर नजर पड़ी जो विचित्र मुद्रा में सड़क पर रेंगते हुए भीख मांग रहे थे। यह विचलित कर देने वाला दृश्य था।
प्रशासन को ऐसे लोगों के इस तरह के प्रदर्शन पर रोक लगानी चाहिए और जो वास्तव में अशक्त और लाचार हैं उनके जीवन यापन की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि दुनिया भर से यहां आनेवाले लोगों के दिलोदिमाग पर केवल भक्ति और इबादत का भाव बना रहे…

पुष्कर और अजमेर से वापस जयपुर की ओर लौटते हुए मैं यही सोच रहा था कि महानगरों की चमक दमक से दूर राजस्थान के ये छोटे छोटे शहर कैसे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को बचाकर देश दुनिया के आगे एक मिसाल कायम कर रहे हैं…

#डॉ. स्वयंभू शलभ

परिचय : डॉ. स्वयंभू शलभ का निवास बिहार राज्य के रक्सौल शहर में हैl आपकी जन्मतिथि-२ नवम्बर १९६३ तथा जन्म स्थान-रक्सौल (बिहार)है l शिक्षा एमएससी(फिजिक्स) तथा पीएच-डी. है l कार्यक्षेत्र-प्राध्यापक (भौतिक विज्ञान) हैं l शहर-रक्सौल राज्य-बिहार है l सामाजिक क्षेत्र में भारत नेपाल के इस सीमा क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए कई मुद्दे सरकार के सामने रखे,जिन पर प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री कार्यालय सहित विभिन्न मंत्रालयों ने संज्ञान लिया,संबंधित विभागों ने आवश्यक कदम उठाए हैं। आपकी विधा-कविता,गीत,ग़ज़ल,कहानी,लेख और संस्मरण है। ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं l ‘प्राणों के साज पर’, ‘अंतर्बोध’, ‘श्रृंखला के खंड’ (कविता संग्रह) एवं ‘अनुभूति दंश’ (गजल संग्रह) प्रकाशित तथा ‘डॉ.हरिवंशराय बच्चन के 38 पत्र डॉ. शलभ के नाम’ (पत्र संग्रह) एवं ‘कोई एक आशियां’ (कहानी संग्रह) प्रकाशनाधीन हैं l कुछ पत्रिकाओं का संपादन भी किया है l भूटान में अखिल भारतीय ब्याहुत महासभा के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विज्ञान और साहित्य की उपलब्धियों के लिए सम्मानित किए गए हैं। वार्षिक पत्रिका के प्रधान संपादक के रूप में उत्कृष्ट सेवा कार्य के लिए दिसम्बर में जगतगुरु वामाचार्य‘पीठाधीश पुरस्कार’ और सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अखिल भारतीय वियाहुत कलवार महासभा द्वारा भी सम्मानित किए गए हैं तो नेपाल में दीर्घ सेवा पदक से भी सम्मानित हुए हैं l साहित्य के प्रभाव से सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-जीवन का अध्ययन है। यह जिंदगी के दर्द,कड़वाहट और विषमताओं को समझने के साथ प्रेम,सौंदर्य और संवेदना है वहां तक पहुंचने का एक जरिया है।

matruadmin

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।