शाम की तन्हाई और गंगा की तट

aashutosh kumar
आज की भाग दौड़ भरी जिन्दगी के बीच गंगा किनारे जाना और घंटो बैठकर लहरों को निहारना उसके सुन्दर दृश्यों को अनुभव करना अपने आप में एक अलग ताजगी का एहसास कराता है मैं लगभग रोज ही गंगा तट पर जाया करता था लेकिन अब रूटीन बिगड गया है। प्रायः काम की व्यस्तता की वजह से आज मैं घर से ही सोचकर चला कि शाम में कुछ घंटे तट पर बैठूगा।वहाँ पहुँचकर अतीत से तुलनात्मक विमर्श दिमाग में चलने लगा।कैसे यहाँ समय-समय पर भव्य मेला का आयोजन होता था लोग दूर दराज से आते थे और पवित्र गंगा में डूबकी लगाते पूजा अर्चना करते। अब तो घारा भी दूर दिखाई देती जैसे रास्ते बदल गये हों।दूर तक नदी किनारे भी बडी-बडी बिल्डिंग दिखाई पडती है इस किनारे पर सिर्फ बरसात के दिनो मे घारा आती है नदी का दूर होना बदस्तूर जारी है गाद की समस्या ने प्रवाह की दिशा बदल कर रख दी नतीजा दूर पैदल चलकर मुख्य घारा में जाना होता है।इन्ही विचारों में खोया हुआ मैं तट पर पुरानी यादो का स्मरण कर सोच रहा था कि वह कितना प्यारा शाम का समय हुआ करता था ,ठीक प्रायः गोधुलि वेला से दो घड़ी पहले का प्रहर, अपने आप में बहुत सारी रोचकता को समेटे हुए मैं गंगा के किनारे बैठकर लहरों से अठखेलियाँ करती सूर्य की मध्यम रोशनियों में निहारता रहता था, घाटो पर बनी हुई सीढ़ियाँ  में उतरना  तो ऐसा प्रतीत होता था मानो वो गंगा नदी नही पवित्रता की समृद्ध और सर्वव्यापी संसार में कदम रख दिया हूँ और एक आज का समय है किनारा वही नदी वही पवित्रता गुम सी हो गयी। घाटो के इर्द गिर्द गंदगी का अंबार पडा है साफ सफाई का नामो निशान नही बस दो चार कचरे बिनने वाले जरूर वहाँ आ जाते हैं पानी भी अब पहले जैसी निर्मल नही वो मीलो की गंदगी और शहरो की गंदगी जबसे गंगा में गिरने लगी पानी को दूषित किये जा रहा।गंगा अस्तित्व है समाज की स्वच्छता की आस्था की गंगा प्रतीक है संस्कार की सौहार्द की संस्कृति की और तो और गंगा मुख्य स्त्रोत है जल का ऐसे प्रदूषित गंगा से हम जीवन और लोक आस्था की कल्पना कैसे कर सकते हैं।न जाने कितनी सरकारे आयी और गयी पर गंगा को सबने ठगा है करोडो करोड़ खर्च भी हुए पर नतीजा क्या निकला आज इस विकट परिस्थति को देखकर मै
वहां किनारे बैठा भाव विहोर हो रहा था। सहसा किसी ने एक छलाँग लगाई और ध्यान तोड़ा मैं अब आस पास के वातावरण के बारे में सचेत हुआ।गंगा के मछुआरे अब अपने घर लौट रहे थे वे डाल्फिन को गाय के समान पूज्य समझते हैं और इसे कभी मारते नहीं हैं । नदी के बीच में तैरती हुई नाव, को देख रहा था जो मध्यम पड़ती रोशनीयो में एक अलौकिक दृश्य बना रहा था दूर होते सूर्य अस्त होने को था आह! क्या आँखो को सुख सा प्रतीत हो रही थी ।जैसे वो दृश्य कह रही हो, सब ठीक हो जाएगा और सब अच्छा होगा ।ऐसी भावनायें मन में प्रबल उत्साह का संचार करती है ।गंगा साक्षी है जीवन के आरंभ की, अनेक छोटी -बड़ी खुशियों की, नव-विवाहित जीवन के प्रारंभ की और जीवन की अंतिम यात्रा का भी।एक ऐसी माता जो सुख-दुख में हमेशा भागीदार रहती
है ।  उदासी में, या प्रसन्नचित्त में, आशीर्वाद लेते वक्त, या फिर पर्व त्योहार में, गंगा खुले मन से सम्मिलित होती हैं अब धीरे-धीरे अंघेरा गहरा होने चला था  दूर  जाती हुई नाव मन में एक अनजाना रहस्य का भाव पैदा कर देती । नाव में जलती एक मद्धम सी रोशनी कई-कई बातें कहती सी लगती थी  कुछ जीवन के इस पार की, और कुछ उस पार की।
मैं भी वहाँ से उठकर हाथ पैर घोने के बाद घर की तरफ चलने लगा कुछ शकुन सा और हल्का महसूस कर रहा था। नदी किनारे की फ्रेश हवा ताजगी और एक प्राकृतिक ऊर्जा उत्पन्न करती है जिसका एहसास मै करता रहा हूँ ।कितनी भी गर्मी हो अगर आप नदी के किनारे चले जाए तो गर्मी का एहसास कम हो जाता है  चिन्तन करने के लिए भी नदी का किनारा उपर्युक्त माना गया है । लेकिन आज नदी अपने अस्तित्व को लेकर लगातार चिंता का शबब बना हुआ है बढता शहरीकरण शहर का बढता दायरा जनसंख्या का बोझ और सारे गंदगी को नदी मे गिराने की परम्परा जिस पर रोक लगाने की सख्त जरूरत है ।

“आशुतोष”

नाम।                   –  आशुतोष कुमार
साहित्यक उपनाम –  आशुतोष
जन्मतिथि             –  30/101973
वर्तमान पता          – 113/77बी  
                              शास्त्रीनगर 
                              पटना  23 बिहार                  
कार्यक्षेत्र               –  जाॅब
शिक्षा                   –  ऑनर्स अर्थशास्त्र
मोबाइलव्हाट्स एप – 9852842667
प्रकाशन                 – नगण्य
सम्मान।                – नगण्य
अन्य उलब्धि          – कभ्प्यूटर आपरेटर
                                टीवी टेक्नीशियन
लेखन का उद्द्श्य   – सामाजिक जागृति

matruadmin

Next Post

रहगुज़र

Fri Feb 1 , 2019
जो रहगुज़र हो जाए तेरे तन बदन का मुझे वही झमझमाती बारिश कर दो तुमसे मिलते ही यक ब यक पूरी हो जाए मुझे वही मद भरी ख़्वाहिश कर दो जो रुकती न हो किसी भी फ़ाइल में मेरी उसी “साहेब” से गुजारिश कर दो गर लैला-मजनूँ ही मिशाल हैं […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।