लाचित बरफुकन के देशभक्ति* 

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vani barthakur
बात हैं सन् सोलह सौ सत्तावन की ,
मुगल सेनापति रामसिंह ने
हमला बोला था असम पर
लेकर अनगिनत सेनानी साथ ।
नहीं पीछे थे लाचित बरफुकन
जो थे वीर ,देशप्रेमी
आहोम के सेनापति ।
कम सेनानी लेकर
कैसे रोक सकेंगे शत्रु को ,
रण कौशल जानते थे वो
रातों – रात गड़ बनेंगे
शत्रु आ सकें न आसानी से
सभी मज़दूरों को लगा दिया
मिट्टी खोदें…. गड़  बनाएँ ।
देख रेख करने हेतु
भार सौंपा मामा मोमाई तामुली को।
आधी रात लाचित आए
देखा मामा के साथ साथ
मजदूर भी सोये हैं ।
वो अब हुए चिंता में चकनाचूर
कैसे भगाये शत्रु को दूर ।
हाथ में उठाया तलवार
अपने ही मामा का
सिर किया शरीर से अलग ।
कहने लगा…..
‘देश से मामा बड़ा नही है’।
यह देखकर मजदूर काँप उठे
रातोंरात गड़  बंधे ।
सुबह निकला लाचित बरफुकन
ब्रह्मपुत्र पर नाव लेकर
तप रहा था शरीर बुखार से
फिर भी युद्ध हेतु आगे बढ़ा
गड़ लाँघने वालों को
एक एक कर मार गिराया ।
 मुगलों के सेनापति डर गए
अपनी सेना को लेकर भागे।
ऐसे ही वीर लाचित बरफूकन ने
मुगलों को हराकर असम को बचाया ।
लाचित जैसे वीर के आदर्श को
अपने दिल में प्रतिष्ठित करो,
देश को रक्षा करने हेतु
जान न्योछावर करके
देशभक्ति में लीन हो ।
#वाणी बरठाकुर ‘विभा’
परिचय:श्रीमती वाणी बरठाकुर का साहित्यिक उपनाम-विभा है। आपका जन्म-११ फरवरी और जन्म स्थान-तेजपुर(असम) है। वर्तमान में  शहर तेजपुर(शोणितपुर,असम) में ही रहती हैं। असम राज्य की श्रीमती बरठाकुर की शिक्षा-स्नातकोत्तर अध्ययनरत (हिन्दी),प्रवीण (हिंदी) और रत्न (चित्रकला)है। आपका कार्यक्षेत्र-तेजपुर ही है। लेखन विधा-लेख, लघुकथा,बाल कहानी,साक्षात्कार, एकांकी आदि हैं। काव्य में अतुकांत- तुकांत,वर्ण पिरामिड, हाइकु, सायली और छंद में कुछ प्रयास करती हैं। प्रकाशन में आपके खाते में काव्य साझा संग्रह-वृन्दा ,आतुर शब्द,पूर्वोत्तर के काव्य यात्रा और कुञ्ज निनाद हैं। आपकी रचनाएँ कई पत्र-पत्रिका में सक्रियता से आती रहती हैं। एक पुस्तक-मनर जयेइ जय’ भी आ चुकी है। आपको सम्मान-सारस्वत सम्मान(कलकत्ता),सृजन सम्मान ( तेजपुर), महाराज डाॅ.कृष्ण जैन स्मृति सम्मान (शिलांग)सहित सरस्वती सम्मान (दिल्ली )आदि हासिल है। आपके लेखन का उद्देश्य-एक भाषा के लोग दूसरे भाषा तथा संस्कृति को जानें,पहचान बढ़े और इसी से भारतवर्ष के लोगों के बीच एकता बनाए रखना है। 
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।