*आर्त स्वर नेपथ्य में* *वेदना भरपूर है!* रोज बढ़ती सड़क जैसी, खुदी-उखड़ी भूख को, तक रहे सब धरा बनकर, प्राण! मन के मूक हो! कण्ठ में आकर धँसी पर, पास होकर दूर है! वाचाल! चालें भयंकर, उलझ जाते सरल मन! जाल के दाने उठा, खग! फँस रहे हैं रात-दिन। दीनता […]
काव्यभाषा
काव्यभाषा
