अब की बदरा ऐसे बरसो बुझ जाय धरती की प्यास रे उदासी हटे किसानों की पूरी कर दो आस रे धानी चुनरिया वसुंधरा ओढे दमक उठे श्रृंगार रे चातक बैठा जिस बून्द को पूरी उसकी चाह रे धरती माँ की अन्तस् से सूखी जल धार की स्रोतें छेद हजारों सीने […]
काव्यभाषा
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