फटे-पुराने  कपड़े पहने हुए, चेहरे पे झुर्रियां छाए हुए.. मुँह  लटकाए हुए, हाथ में कटोरा पकड़े.. कांख में पोटली दबाए हुए, माथे पर बदकिस्मती की तकदीर धारियों में लिखाए हुए, उल्टी-पुलटी चप्पल पहने.. बेतहाशा सड़कों पे, तो कभी गली कूचों में.. इधर-उधर चलते-फिरते, दिखने में साधु लगता.. पर है भिखारी, […]

मेरे हिस्से में रात आई, रात का रंग काला है इसमें कोई दूजा रंग नहीं मिला, इसलिए सदा सच्चा है मेरी ज़िन्दगी भी अकेली है, कोई दूजा ना मिला। फिर दिन का हिस्सा, सफेद रंग का है जो दूजे रंग से मिल बना, झूठा-सा दिखता है फिर भी जीवन में, […]

वह आदिवासी लड़की जिसे समझते हैं लोग असभ्य और समझते हैं कि उसके सर में भूसा भरा होता है, जो लीपती है रोज़ गोबर से सने हाथों से घर-आंगन।   जिसे अधिकार नहीं है चूल्हे-चौके से आगे कुछ करने का न ही देहरी लांघ लंबी घुमावदार सड़कों पर अल्हड़-सा बचपन जीने काl, जो सूरज की तपिश निगल जलाती है अपना बदन।   अथक काम करते खेतों में जिसे मजबूरी में कभी रखना पड़ता है गिरवी अपना कुंवारापन, शहरी बाबुओं की भूखी लपलपाती निगाहों के आगे सच मानिए, छूना चाहती है वह भी चमकते चाँद-सितारे, दौड़ना चाहती है वह भी खुले विस्तृत आकाश में अपने रंग-बिरंगे सपनों के पीछे।   चाहती है वह भी, चमत्कृत कर देना पूरी दुनिया को अपने हाथों से रचकर एक प्रेम कविता परंतु,क्या इस सभ्य सुसज्जित समाज में `हासिल` कर पाएगी वह ऐसी दुनिया…l   दुख-दर्द,शर्म-मायूसी से उठकर, क्या एक करनैल का फूल शोभा पा सकेगा, एक स्वस्थ सम्मानित माहौल में… या फिर दम तोड़ देगी वह भी घुटकर अपने मृत होते सपनों के साथ …ll    #डॉ. आरती कुमारी परिचय : […]

‘ना’ कहने की मिली इतनी बड़ी सजा, जो एक खौफनाक परछाई बनकर मेरे सपनों का सदा ही करती रहती पीछा। हाँ कहती तो भी लूटते मुझे,बाद में अपशिष्ट समझ फेंक देते। प्यार तो दिल से होता है, कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं मैं कैसे  ‘हाँ’ कह देती उसको, ‘ना’ कह दी जब […]

ना मैं हिन्दू हूँ, ना मैं मुस्लिम हूँ.. मैं केवल पशु हूँ। बेजुब़ान हूँ ग़र जुबां होती तो तुमको बतलाती, मैं क्या चाहती हूँ। मैं भी जीव हूँ, मुझे भी जीने दो मुझे भी प्रेम करने दो, मुझे भी अपनी पीढ़ी को अगली पीढ़ी में ले जाने दो वरन् मैं […]

‘मैं’ हूँ मेरे अस्तित्व में, किसी और के अस्तित्व में नहीं यही मेरी अहमियत है। ‘मैं’ अन्य मानव व पेड़ पौधों व जीव-जन्तुओं की भाँति, स्वयं सांसें लेता हूँ यही मेरी अहमियत है। ‘मैं’ अपनी उत्तरजीविता के लिए नित्य जीवन संघर्ष करता हूँ, यही मेरी अहमियत है। ‘मैं’ मेरे नाम […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

आपका जन्म 29 अप्रैल 1989 को सेंधवा, मध्यप्रदेश में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर हुआ। आपका पैतृक घर धार जिले की कुक्षी तहसील में है। आप कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। आपने अब तक 8 से अधिक पुस्तकों का लेखन किया है, जिसमें से 2 पुस्तकें पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध हैं। मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष व मातृभाषा डॉट कॉम, साहित्यग्राम पत्रिका के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 21 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण उन्हें वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं और ख़बर हलचल न्यूज़ के संस्थापक व प्रधान संपादक हैं। हॉल ही में साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन संस्कृति परिषद्, संस्कृति विभाग द्वारा डॉ. अर्पण जैन 'अविचल' को वर्ष 2020 के लिए फ़ेसबुक/ब्लॉग/नेट (पेज) हेतु अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से अलंकृत किया गया है।