mradul
तुम मानों
किंचित ये जंगल
कुछ कह रहा है |
तुम्हारें नगरों में अब
मेरा सन्नाटा
अमर्यादित सा बह रहा है |
तुम्हारे शहर में नहीं मिलते हैं
भोर के जागे पंछी
जो अपने मधुर कलरव को
सप्त सुरों में बाँध कर
आदित्य को सप्त रश्मियों का
प्रसाद देते थे |
वो पुष्प भी अब शंकित हो
कंटक आच्छादित अस्तित्व में
मत्त सुवास से विहीन, कुम्हलाये हैं |
मधुप का भ्रमरगान किंचित
भयावहता में प्लवित
एक आर्तनाद सा
मन में अनुनादित होता है |
अभिशप्त से हो गए,
उन नैसर्गिक मधुरवालियों
के प्रतिक्षण फुहारें |
जो चक्षु मृगनयन से
निर्मल निशंक आल्हाद में विस्तारित थे
अब उनमें रक्त अविरलता
की भीषण विभत्सता को ढो रहा है|
तुम मानों
किंचित ये जंगल
कुछ कह रहा है |
तुम्हारे नगरों में अब
मेरा सन्नाटा
अमर्यादित सा बह रहा है |
               #मृदुल जोशी

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