सफरनामा

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swayambhu 

भाग-१ …………………

१९८२-८५ मेरे छात्र जीवन का व्यस्ततम समय थाl मोतिहारी के एम.एस. महाविद्यालय में बीएससी(ऑनर्स) की पढ़ाई चल रही थी। वहीं पंचमन्दिर इलाके में एक किराए के मकान में रहना होता था। भौतिकशास्त्र की जटिल पढ़ाई और परीक्षा की तैयारियों के बीच औसतन हर रोज एक कोई रचना जरूर मुकम्मल कर लेता था। मेरे भौतिक
शास्त्र के नोट्स के बीच कविता के पन्नों का मिलना सामान्य बात थी। मेरे मित्र और गुरुजन भी इस बात से वाकिफ थे।भौतिकशास्त्र विभाग के डॉ.रघुवंश चौधरी,शम्भूशरण सिंह,डॉ. राघव प्रसाद सिंह एवं रसायन शास्त्र विभाग के प्रो. भूपेंद्र नारायण सिंह समेत दूसरे विभाग के भी कुछ शिक्षकों को मैंने अपनी किताब भेंट की थी। वे सभी मेरी रचनाओं और बड़े-बड़े साहित्यकारों के पत्रों के बारे में जानकर प्रसन्न होते थे और मुझे प्रोत्साहित करते थे,लेकिन भौतिक शास्त्र विभाग के प्रमुख प्रो. एस.के.रायचौधरी के साथ मेरी सबसे अधिक घनिष्ठता बनी। उनका विशेष स्नेह और प्रोत्साहन मुझे आगे भी प्राप्त होता रहा। उनका पूरा परिवार कला और संगीत का प्रेमी था। घर में बाकायदा शास्त्रीय संगीत का अभ्यास होता था। हर कोई गायन,वादन या नृत्य में निपुण था। भौतिक शास्त्र की ऊबा देने वाली कक्षा की दिनचर्या के बीच कभी-कभार का यह संपर्क थोड़ी राहत देता था। मेरे सहपाठी मित्र विजयकुमार सिंह को भी कविताओं में थोड़ी-बहुत रूचि थी। उसे मैंने अपनी तीसरी किताब भेंट की थी। वह हमेशा कक्षा में दोस्तों के बीच मेरी ग़ज़ल की पंक्तियां सुनाया करता था। अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. जनार्दन प्रसाद भी मेरी रचनाओं से प्रभावित थे। मोतिहारी से निकलनेवाले सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में उनके माध्यम से मेरी रचनाएं छपीं। कई लेखकों-संपादकों से उन्होंने मेरा परिचय कराया। महाविद्यालय परिसर के अंदर ही उनका निवास था,जहां मेरा अक्सर आना-जाना होता था। इस कड़ी में एक बेहद नेक दिल इंसान खुर्शीद आलम भी याद आते हैं। हिंदी साप्ताहिक पत्र के वे प्रकाशक-संपादक थे। लगभग दो वर्ष तक उन्होंने मेरी रचनाओं को लगातार अपने अख़बार में प्रकाशित किया। ‘स्वयंभू शलभ की रचनाएं’ नाम से उन्होंने एक पृष्ठ ही बना डाला था। अप्रैल १९८४ में जब रेडियो मास्को से मेरी कविताओं का प्रसारण हुआ,तो सबसे पहले यह खबर इस पत्र ‘दफीना’ के जरिए ही सुर्ख़ियों में आई।
हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. रामाश्रय प्रसाद सिंह के साथ तो मैं ११वीं के समय से ही घनिष्ठता से जुड़ा हुआ था। मेरी तीसरी किताब ‘अनुभूति दंश’ की भूमिका उन्होंने लिखी थी। महाविद्यालय की पत्रिका के संपादन में भी मैं उनके साथ था। छात्र-छात्राओं को कविता- कहानी लिखने के लिए प्रेरित करना, उनसे रचनाएं तैयार करवाना फिर उनका सुधार करके प्रकाशन हेतु चयन करना, यह तमाम जिम्मेवारी मेरी थी। इस दौरान कई विद्यार्थी अपनी खास अनुभूतियों के बारे में बताते हुए मुझसे ही अपने लिए कुछ लिखने की जिद करते थे। उनकी भावनाओं को शब्द देते हुए भी मुझे खुशी होती थी। यह एक ऐसा जरिया था, जिसकी बदौलत कई सारे विद्यार्थी मुझे पहचानने लगे थे।
इस समय मेरे अंदर जज़्बातों का एक तूफान मचल रहा था और मैं हर पल उस तूफान को शब्दों में बांधने की जद्दोजहद से गुजर रहा था। उन दिनों मेरे हालात वाक़ई मेरे वश में नहीं थे। उसी दौरान मेरी चौथी किताब ‘श्रृंखला के खंड’ भी प्रकाशन में जा चुकी थी…।
(क्रमश…इंतज़ार कीजिए दूसरे भाग का)

                                                                                                            #डॉ. स्वयंभू शलभ

परिचय : डॉ. स्वयंभू शलभ का निवास बिहार राज्य के रक्सौल शहर में हैl आपकी जन्मतिथि-२ नवम्बर १९६३ तथा जन्म स्थान-रक्सौल (बिहार)है l शिक्षा एमएससी(फिजिक्स) तथा पीएच-डी. है l कार्यक्षेत्र-सहायक प्राध्यापक(नेपाल) हैं l शहर-रक्सौल राज्य-बिहार है l सामाजिक क्षेत्र में भारत नेपाल के इस सीमा क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए कई मुद्दे सरकार के सामने रखे,जिन पर प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री कार्यालय सहित विभिन्न मंत्रालयों ने संज्ञान लिया,संबंधित विभागों ने आवश्यक कदम उठाए हैं। आपकी विधा-कविता,गीत,ग़ज़ल,कहानी,लेख और संस्मरण है। ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं l ‘प्राणों के साज पर’, ‘अंतर्बोध’, ‘श्रृंखला के खंड’ (कविता संग्रह) एवं ‘अनुभूति दंश’ (गजल संग्रह) प्रकाशित तथा ‘डॉ.हरिवंशराय बच्चन के 38 पत्र डॉ. शलभ के नाम’ (पत्र संग्रह) एवं ‘कोई एक आशियां’ (कहानी संग्रह) प्रकाशनाधीन हैं l कुछ पत्रिकाओं का संपादन भी किया है l भूटान में अखिल भारतीय ब्याहुत महासभा के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विज्ञान और साहित्य की उपलब्धियों के लिए सम्मानित किए गए हैं। वार्षिक पत्रिका के प्रधान संपादक के रूप में उत्कृष्ट सेवा कार्य के लिए दिसम्बर में जगतगुरु वामाचार्य‘पीठाधीश पुरस्कार’ और सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अखिल भारतीय वियाहुत कलवार महासभा द्वारा भी सम्मानित किए गए हैं तो नेपाल में दीर्घ सेवा पदक से भी सम्मानित हुए हैं l साहित्य के प्रभाव से सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-जीवन का अध्ययन है। यह जिंदगी के दर्द,कड़वाहट और विषमताओं को समझने के साथ प्रेम,सौंदर्य और संवेदना है वहां तक पहुंचने का एक जरिया है।

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29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।