समस्या,एक ‘राष्ट्रीय समस्या’ की !

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manoj jony

एकाएक हमारा राष्ट्र जैसे बिलकुल अनाथ-सा हो गया है। न कोई माँ,न बाप,न भाई,न बहन। न कोई खुशी,न गम। न कोई काम,न आराम। हिंदुओं-मुसलमानों-सिक्खों-ईसाइयों की भीड़ में बिलकुल अकेला। ब्राह्मणों,क्षत्रियों,वैश्यों और शूद्रों से खचाखच भरे होने के बाद भी एक-एक भारतीय के लिए तरसता, बिल्कुल तन्हा-सा हो गया है। आजकल जैसे सोशल मीडिया  पर बातें तो खूब होती हैं,लेकिन आमने-सामने कोई किसी से बात करना तो दूर,देखना भी नहीं चाहता,उसी तरह हर जाति-धर्म के लोग अपनी-अपनी राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत तो हैं, परन्तु सबका एक राष्ट्र नहीं है। सबके अपने-अपने राष्ट्र हैं, सबकी अपनी-अपनी राष्ट्रभक्ति। कुछ भी हो,हमारे देशवासी, राष्ट्र के अकेलेपन को दूर करने में जी-जान से लगे हैं। राष्ट्र के नाते-रिश्तेदारों और खान-पान को ढूँढने में शिद्दत से लगे हैं। एक स्वयंभू राष्ट्रवादी ने कहा-`गाय को ‘राष्ट्र-माता’ घोषित कर दिया जाए। राष्ट्र को माँ मिलते ही उसका सारा दुख दूर हो जाएगा।` दूसरे राष्ट्रवादी ने कहा-`खिचड़ी को ‘राष्ट्रीय भोजन’ घोषित किया जाए,इससे राष्ट्र के खाने-पीने की समस्या हल हो जाएगी।`

वैसे हमारे समस्या प्रधान देश में माँ-बाप या खाना-पीना ढूँढना कोई बड़ी समस्या नहीं है। बड़ी समस्या तो ये है कि, किस समस्या को ‘राष्ट्रीय समस्या’ घोषित किया जाए ? इस सवाल के जबाब के लिए मुझे बुद्धू-बक्से में आशा की किरण नजर आई। मैंने टीवी खोला तो देखा सभी चैनल चारों पहर रानी पदमावती को लेकर स्टूडियो में तलवारें भाँज रहे हैं। मैं सोच ही रहा था कि ‘पदमावती` फिल्म को ही ‘राष्ट्रीय समस्या’ घोषित कर दिया जाए,जिससे देश की सभी महिलाओं का मान-सम्मान बढ़ जाए,उन पर अत्याचार कम हो जाएँ,लेकिन इसके पहले कि मैं किसी निष्कर्ष पर पहुँचता, अगले दिन चैनलों में लव-जेहाद पर भिड़ा-भिड़ी होने लगी। तब समझ में आया कि देश की सभी समस्याओं की जड़ तो हिन्दू-मुस्लिम विवाह है,अगर लड़की हिन्दू हो तो। जब उच्चतम न्यायालय और एनआईए लव-जेहाद को देखने लगे, तब मुझे लगा कि,इससे बड़ी राष्ट्रीय समस्या तो कोई हो ही नहीं सकती। इसके पहले कि मैं ‘लव-जेहाद’ को ‘राष्ट्रीय समस्या’ घोषित करता,चैनलों ने राम-रहीम और उनकी चेली हनीप्रीत की समस्या को पानी पी-पीकर दिखाना शुरू कर दिया। बेचारे पत्रकार भूखे-प्यासे हनीप्रीत को खोजने के लिए दर-दर भटक रहे थे। हर चैनल ने राम-रहीम की गुफा के रहस्य बताने में अपने को झोंक रखा था। न किसी को गैस सिलेण्डर के दाम दुगने होने की चिंता,न टमाटर के दाम बढ़ने की फ़िक्र। सब बस हनीप्रीत और राम-रहीम की चिंता में दुबले हुए जा रहे थे। अभी मैं निश्चय कर ही रहा था कि,हो न हो ‘राष्ट्रीय समस्या’ तो‘राम-रहीम’ ही है,तभी चैनलों ने ‘सेक्स-सीडी’ की अखिल-पार्टी-व्यापी समस्या पर चर्चा शुरू कर दी। कभी मंत्री की सीडी,कभी नए-नए नेता की सीडी। शिक्षा के एबीसीडी का तो किसी को ध्यान ही नहीं रहा,सब तो नेताओं की ‘सेक्स-सीडी’ में ही मस्त हो गए। चूंकि,‘सेक्स-सीडी’ की समस्या अमूनन सभी दलों में पाई जाती है,इसलिए सर्वसम्मति से इस समस्या को ‘राष्ट्रीय समस्या’ घोषित करने का प्रस्ताव मैंने राजनीतिक दलों के समक्ष रखा,लेकिन यह क्या,कांग्रेस बोलने लगी-संसद का शीत-कालीन सत्र न बुलाना राष्ट्रीय समस्या है,तो भाजपा ने कहा कि-कांग्रेस ही राष्ट्रीय समस्या है। सपा-बसपा ने चुनाव हारने के बाद कहा कि- ईवीएम राष्ट्रीय समस्या है। किसी को ‘शहजादा’ तो किसी को ‘शाह-जादा’ राष्ट्रीय समस्या लगता है। अंत में सभी दल इस बात पर एकमत हुए कि ‘चुनाव’ ही ‘राष्ट्रीय समस्या’ है, लेकिन जनता अभी भी चिल्ला रही है कि ‘महँगाई’,‘बेरोजगारी’,‘शिक्षा’,‘स्वास्थ्य’…‘राष्ट्रीय समस्या’ है। मेरे लिए तो ‘राष्ट्रीय समस्या’ घोषित करना ही बड़ी समस्या हो गई हैl

#मनोज जानी

परिचय:मनोज कुमार का साहित्यिक उपनाम-`मनोज जानी` हैl आपकी जन्मतिथि-७ जुलाई १९७६ और जन्म स्थान-जौनपुर(उत्तर प्र देश)हैl वर्त मान में आप फ़रीदाबाद (हरियाणा) स्थित एनएचपीसी कालोनी के सेक्टर ४१ में रहते हैंl आपने इलाहाबाद से अभियांत्रिकी (विद्युत) में स्नातक किया है तो वाराणसी से एम.टेक. सहित एमबीए भी हैंl आपका कार्यक्षेत्र भूटान के ट्रोड्रग्सा (एनएचपीसी इकाई) में प्रबंधक का है। लेखन की विधा-व्यंग्य,ग़ज़ल तथा कविता हैl प्रकाशन में आपके खाते में `चिकोटी`,`ठिठोली (व्यंग्य संग्रह )` सहित `आईने के सामने(काव्य संग्रह)` हैl उपलब्धि यह है कि,कई प्रसिद्ध पत्र-पत्रि काओं में १९९८ से सतत व्यंग्य रचनाएं छप रही हैं। सम्मान देखें तो आपको `चिकोटी` के लिए उत्तर प्रदेश सरकार से वर्ष -२०१४ का `शरद जोशी सम्मान` मिला हैl आप लेखन में ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं,और लेखन का उद्देश्य-सामाजिक और राजनीतिक जागरुकता पैदा करना है। 

 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।