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दिल्ली जीती-मरती है
Mon Nov 13 , 2017
कल तक माता के आँचल में,बैठ सभी सुख पाते थे। भूखे-नंगे,लावारिस भी,जीवन जीने आते थे॥ कभी वृक्ष रूपी हड्डी को काटा,काम किया अपना। अपने सपनों के चक्कर में,जला दिया माँ का सपना॥ किन्तु आज कुहरे में लिपटी,दिल्ली आहें भरती है। अपने ही बच्चों के कारण,दिल्ली जीती- मरती है॥ माता यमुना […]

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