प्रेम

1
Read Time3Seconds
cropped-cropped-finaltry002-1.png
नदी  की  कलकल,
ध्वनि-सी  करती
नाचती, इठलाती, बलखाती,
बावरी-सी  हो  गई  हूँ
आजकल  मैं  एक,
समन्दर की  खोज  में।
मेरे  मन  का  उल्लास,
मुझे  रूकने  नहीं  देता
थमने  नहीं  देता,
दौड़  पड़ती हूँ  मैं
हर  उस  परछाईं  की  ओर,
जो  तुम-सी लगती  है
तुम-सी दिखती  है।
बह जाती  हूँ पवन  की
उस  गति  के  साथ,
जो  तुम्हारा  पता  बता  दे
हूँ  तो  मैं  एक  प्रेम की  सरिता,
पर  एक  प्यास-सी  उठी
है  मेरे  मन  में  पिया  मिलन  की।
एक  जिद-सी है तुम्हें पाने  की
तोड़  देना  चाहती  हूँ  सारी,
रस्में इस जमाने  की
कितनी चट्टानों ने,
मेरा रास्ता रोका
कितने  किनारों  ने,
अपने  दायरे  समेटे
पर  रोक  न  पाया  कोई  भी,
मेरे  चट्टानी  बुलंद  इरादों  को।
भला  तूफान  भी  थमतें हैं कभी
फिर  यह  तो  प्रेम  है,
निश्छल, निर्मल,पावन,पवित्र
मंदिर की घंटियों-सा बजता हुआ,
मेरी धाराओं में
प्रतिपल बहता हुआ,
मैं  जिधर से भी गुजरी
पवित्र  हुआ वातावरण,
अपने पीछे छोड़ आई हूँ मैं
एक  लम्बा आँचल,
जिसमें  हजारों श्रद्धासुमन
लहलहाते  हैं  प्रतिपल।
तुम्हें पाने के लिए अपना
अस्तित्व  तक  खोई  हूँ  मैं,
मेघ  बन  न जाने
कितनी बार रोई हूँ मैं,
अब  आ पहुँची  हूँ
तुम्हारे  समीप,
ऐसा आभास हुआ है मुझे।
पर्वत  के  उस  पार,
खड़े हो  तुम  बाँहें  पसार
मैं हर संभव जतन करती,
सुध-बुध  खोई  हुई
उफनाती,गिरती,पड़ती,
समां  जाती  हूँ  तुममें।
अब  शांत है  मेरी  धाराएं,
मेरा  निर्मल  मन
हाँ चाँद की चाँदनी रात में,
चाँदी जैसा चमकता है मेरा यौवन
सूरज  की  किरणें  मेरी  माँग  में,
सिन्दूर-सी  सजतीं हैं
और  दमकता  है  मेरा  यौवन।
मेरा प्यार, मेरा श्रंगार सिर्फ तुम,
मेरे जीवन का हर आधार सिर्फ तुम
मेरी कल्पना मेरी सोच सिर्फ तुम,
मेरे  जीवन  की  हर  एक  खोज
सिर्फ तुम, सिर्फ तुम, सिर्फ  तुम
सिर्फ तुम, सिर्फ तुम, सिर्फ तुम॥
                                                                     #वन्दना श्रीवास्तव

परिचय : वन्दना श्रीवास्तव का उपनाम -वान्या है। उत्तर प्रदेश राज्य के जिला लखनऊ की डिलाइट होम कालोनी में आपका निवास है।जन्मतिथि २७ जुलाई १९८१ है। लिखना आपकी पसंद का कार्य है।

0 0

matruadmin

One thought on “प्रेम

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

लम्हों की किताब

Mon Aug 28 , 2017
  आधी रात सन्नाटों की नीरवता में, व्याकुलता जब बढ़ने लगी दिल में फिर खलबली-सी, मचने लगी दिल की किताब के चंद पन्ने, पलट गए लम्हों की ओर चंद किस्से बचपन के हंस पड़े किलकारी मार। माँ के आँचल बाप की ऊँगली, दादी-नानी  की कहानी चाचा की पीठ बुआ ढीठ, […]

Founder and CEO

Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।