तन्हाई (किसान के जीवन में)

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g s parmar
जीवन सरिता में,
डोले मेरी नैया क्यूं ?
तुमको है सुख का सागर,
मुझे खुशियों से किनारा क्यूं ?
घनी धूप से लड़कर,
रज कण बहाता हूँ।
तन चंदन घिसकर अपना,
अस्तित्व तिलक लगता हूँ।
देता सबको उजाला मैं,
मेरे जीवन में अंधेरा क्यूं ?
जीवन सरिता में,
डोले मेरी……..?
मेरी तन्हाई की धरती पर,
कभी सुख की बरखा हो।
कहते हो हम साथ हैं तुम्हारे,
क्यों फिर तुम घबराते हो ?
जब तुम थे साथ हमारे तो,
जिंदगी यूं मैंने ठुकराई क्यूं ?
जीवन सरिता में ,
डोले मेरी……..?
आँखों की बेटी से,
हुई दुःख की सगाई है।
सूख चले हैं आँसू सारे,
आँखों में बसी अब तन्हाई है।
तन्हाई की दुनिया में,
मालिक ये बस्ती बसाई क्यूं ?
जीवन सरिता में,
डोले मेरी नैया क्यूं ?
तुमको है सुख का सागर,
मुझे खुशियों से किनारा क्यूं ?
                                                                                        #जी.एस.परमार
परिचय: जी.एस.परमार का निवास मध्यप्रदेश के नीमच में है। शिक्षा-एम.ए. (अंग्रेजी साहित्य) तथा ४२ वर्ष के हैं। पेशे से आप शिक्षक होकर पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं लिखते हैं। ब्लॉग पर भी कई रचनाएं दे चुके हैं। रविन्द्रनाथ ठाकुर जी की छोटी उम्र में ही लेखन की बात से प्रेरित होकर आपने लिखना शुरू किया,पर संकोची स्वभाव होने से लिखकर फाड़ देते थे। अब रचनाएँ प्रकाशन में भेजते रहते हैं।

matruadmin

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।