एक और अधूरी प्रेम कहानी…

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भाग १….
महाविद्यालय की छुट्टियां हो चुकी थी, इस बार कहीं घूमने जाने का कोई कार्यक्रम नहीं बनाया,इसलिए ख़ाली समय ज्यादातर सोशल मीडिया पर बिताया करती थी। बहुत दोस्त बने, पर राजीव नाम का लड़का मुझे रोज संदेश भेजा करता था ,जो अपने आपको बनारस का बता रहा था।
हमारी रोज बात हुआ करती थी। धीरे-धीरे हम अच्छे दोस्त बन गए। वह बहुत बातें करता था। कभी-कभी तो मुझे डर लगता था,फिर भी इस अजनबी से बात कर लेती थी।
एक दिन बात-ही-बात में उसने मेरी तस्वीर मांगी पर,मैंने मना कर दिया। फिर भी कुछ दिन बाद भेज दी।
-तुम बहुत सुंदर हो,जैसे चाँद जमीन पर उतर आया….जैसे आसमान से आई एक खूबसूरत परी हो…’यू आर रियली ब्यूटीफुल…’
ऐसा लगा जैसे कि,राजीव मेरी तस्वीर देखकर पागल हो गया हो।
फेसबुक पर बात करते-करते कब फ़ोन से और कब मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ,पता ही नहीं चला। दरअसल वो बनारस का था पर,दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र था।
एक दिन उसने प्रस्ताव भी दिया,लेकिन मैंने मना कर दिया। मुझे अजीब लगा कि,मैंने उसे मना क्यों किया। वो आधुनिक नहीं था,लेकिन अच्छा लड़का था। मुझे भी उससे लगाव हो गया था,पता नहीं क्यों,वो मुझे अच्छा लगने लगा था,हर बार मिलने को दिल चाहता था।
एक दिन दोनों बगीचे में मिले..सरला खड़ी थी,पेड़ के पत्ते के छोटे-छोटे टुकड़े करके जमीन पर फेंक रही थी।जैसे कि वो तनाव में थी,मन में अजीब-सी टीस थी..तभी राजीव बोला-अरे सरला तुम यहाँ खड़ी हो,और मैंने तुझे कहाँ-कहाँ नहीं ढूंढा….तुम भी ना..
-बस ऐसे ही यहाँ खड़ी हो गई। जल कितना शांत और निर्मल है,क्या मनुष्य भी ऐसा हो सकता है? सामने पुल की ओर इशारा करते हुए उदास मन से कहा।
-‘क्या हुआ सरला! बहुत उदास लग रही हो।’ राजीव ने पूछा।
-कुछ नहीं यार।
-अगर कोई परेशानी है तो,मुझे अपना समझकर बांटो।
-‘क्या बताऊँ यार, हमें तो अपनों ने ही मारा है। समझ नहीं आ रहा ,किस पर विश्वास करुं,पुरुषों पर तो भरोसा ही नहीं रहा।’सरला ने दर्दीले स्वर से कहा।
सुनकर राजीव सरला के पास आया ओर कन्धे पर हाथ रखकर बोला-
‘आखिर बात क्या है ?’
-‘मेरे परिवार की अंतर्कलह…माँ-बाप का अलगाव….।’
जी हाँ, सरला बेशक अच्छे परिवार से और इकलौती संतान थी,पर माँ-बाप के आपसी झगड़े बचपन से देख रही थी। बात-बात पर झगड़ना,मारपीट करना सरला के पिता की आदत थी। कल रात तो हद कर दी-सरला को दो थप्पड़ जड़ते हुए पूछा
-तुम फोन पर किससे बातें करती हो,दिन -रात बस लगी रहती हो?
-‘नहीं पापा,किसी से नहीं करती हूँ।’ सिर झुकाकर धीरे से सरला ने कहा।
इतने में सरला की माँ आई और बोली
-‘आप इसे क्यों मार रहे हो’?
-‘तुमने ही बिगाड़ा है इसे,पूछो इसको…ध्यान रख इसका,नहीं तो ये…..’
ऐसे जोर से बकते हुए पिताजी चले गए।
कल रात की घटना सरला से सुनकर राजीव भी परेशान हो उठा।
-‘अब तुम ही बताओ,मैं क्या करुं?’ सरला ने पूछा।
-तेरी ये परेशानी देखी नहीं जाती,एक बात कहूं!
-कहो।
-‘क्यों न हम शादी कर लें,मैं तुझे बहुत खुश रखूँगा। किसी बात की कोई परेशानी नहीं होगी,सिर्फ मैं और तुम।’
    सरला ने कोई जबाब नहीं दिया। दोनों बात करते-करते बाजार की ओर चल निकले,तभी सरला के पिताजी ने देख लिया। वो सरला को पकड़कर घर ले गए..।(शेष अगले भाग में..)
                                                                                                              #एल.आर. सेजू
परिचय : एल.आर. सेजू थोब राजस्थान की तहसील ओसिया(जिला जोधपुर) में रहते हैं।आपको हिन्दी लेखन का शौक है। अधिकतर लेख लिखते हैं।

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