गौरेया का संरक्षण ज़रुरी

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amit chandrvanshi
एक पहल करनी होगी गौरेया को बचाने के लिए,क्योंकि गौरेया कम देखने को मिलती है। यह आए दिन विलुप्त होती जा रही है। सर्वप्रथम हमें बाग-बगीचों को बढ़ाना होगा,पीपल,आम और बरगद के पेड़ लगाने होंगे तथा विलुप्त हो रही इस पक्षी की नस्ल को बचाने के लिए एकसाथ कार्य करना होगा। यह मत सोचो कि सब करेंगे,तब हम करेंगे। आप करते रहिए,क्योंकि सत्य के पीछे काफिला होता है। चिड़ियाघरों में भी आजकल चिड़िया की चहचहाहट गुम हो रही है,इसे बचाना होगा। गर्मी के दिनों में घर के छत के ऊपर पानी और अन्न रखें,जिससे चिड़िया को भूख-प्यास नहीं रहेगी और विलुप्त होने से भी बचेगी। आजादी सभी के लिए है,आजाद रहना सभी को अच्छा लगता है,इसलिए चिड़िया को कैद करके घर में न रखें।
 बहुत सारे अभ्यारणों में आए दिन पक्षियों की कमी हो रही है,इसलिए एकजुटता से पर्यावरण को बचाना होगा। समाचारों और जागरूकता के माध्यम से सभी को दिशा-निर्देश देने होंगे कि,पक्षी को मारे नहीं,उसे जीने दें,क्योँकि आजादी सभी का हक है।
‘मुक्त आसमान में उड़ान बाकी है,
हवा के साथ उनका पैगाम बाकी है।
उन्हें शांति से आजाद रहने दो,
उनके नाम भी आजादी का पैगाम है।’
अगर आप पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करते हैं, तो वह दिन दूर नहीं,जब आपके साथ खिलवाड़ होगा और वक़्त का पहिया धीमा पड़ जाएगा,तब विनाश निश्चित हो जाएगा।
छोटी-सी बात है-एक दिन पिंजरे में बंद चिड़िया से पूछा-कैसा लगता है ?
चिड़िया बेबस होकर बोली-
दम घुटता है बेजुबान हूं,इसलिए मेरा फायदा उठा रहे हैं। काश ये पिंजरे नहीं बने होते तो,मैं भी मुक्त आकाश में उड़ पाती। मेरी चोंच सूज गई है पिंजरे को काट-काटकर,पर आजाद नहीं हूं।आखिर अब मुझे यहीं बंधुआ रहना है।
चिड़ियों की दशा की तरह आज हमारे समाज में बाल मजदूरी भी बड़ा नासूर है,जो देश की सबसे बड़ी समस्या है। गौरेया और बच्चों को बचाने के लिए बहुत काम करने की जरूरत है।

                                                                                         #अमित चन्द्रवंशी ‘सुपा’

परिचय:अमित चन्द्रवंशी ‘सुपा’ नाम से लिखते हैं। १८ वर्ष उम्र और अभी विद्यार्थी ही हैं। आपका निवास छत्तीसगढ़ के रामनगर(कवर्धा) में है।कविता,कहानी,गीत,गजल और निबन्ध आदि भी लिखते हैं।
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।