आखिरी बार

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sandeep
हाँ वो जनवरी 2 ही थी,जब वह मिताक्षरा से आखरी बार मिलने गया था। उसके मन में प्यार को लेकर तड़प-जलन-शिकवा-शिकायत सब कुछ था जिसे वो आज अपनी मीतू के सामने कह देना चाहता था। उसकी याददाश्त भी इतनी जबरदस्त कि,पिछले ७ सालों का हर लम्हा अंगुली पर गिना सके।
जैसे ही वह मिताक्षरा के कमरे पर पहुंचा,वहां नजारा ही दूसरा था।
‘मैं जा रही हूँ अतुल,मेरा तबादला यहाँ से बरेली हो गया है।’
मिताक्षरा और अतुल पिछले ७ साल से अनूप शहर के केन्द्रीय विद्यालय में प्रवक्ता थे। मिताक्षरा इंग्लिश पढ़ाती थी और अतुल केमिस्ट्री। उसका शासकीय कारणों से तबादला हो रहा था।
‘क्यों मिताक्षरा तुम ही क्यों? क्या मेरा तबादला……?’
‘कैसी बातें करते हो? ये परीक्षा की ड्यूटी नहीं है कि,चलो तुम्हारी जगह मैं चला जाता हूँ,अतुल ये तबादला है और वो भी शासकीय कारणों से..और हाँ,फिर लोगो को मुश्किल से गृह- जनपद मिलता है और …..।’
‘मैं जानता हूँ,लेकिन फिर भी अगर कुछ हो पाए!’
‘मैं जाना नहीं चाहती,लेकिन शासकीय मज़बूरी है जो जाने को मजबूर करती है।’
‘मीतू,मैं तो तुम्हारे बिना साँस भी लेने की कल्पना नहीं कर सकता।’
‘नहीं अतुल,अब इन सब बातों के कोई मायने भी नहीं।’
‘नौकरी छोड़ दो,चली आओ मेरे पास हमेशा-हमेशा के लिए।’
‘और वहां जो माँ-बाप हैं,जिनकी सांसें मुझ इकलौती बेटी की सांसों में बसी हैं।’
‘उनसे बात करने का मुझे मौका दो मीतू, मैं…..।’
‘मानेंगे ही नहीं,मेरे माँ-बाप हैं,मैं अच्छे से जानती हूँ।’
‘फिर दोनों ये दुनिया ही छोड़ दें।’
‘तुम पागल हो अतुल, इश्क ने…!
-मिताक्षरा अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई।
‘मीतू हाँ,तुम्हारे इश्क ने मुझे पागल कर दिया।’
-अतुल ने उसका हाथ पकड़ लिया-‘ये क्या,एक हाथ में केवल एक चूड़ी और दूसरे हाथ में दर्जन भर और साथ में ये मेहँदी ?’
मिताक्षरा ने हैरानी से अतुल को देखा और कहा-‘कल शाम को मेरी अंगूठी की रस्म भी है।’
‘अं….गू…ठी….।’
‘हाँ अतुल,अंगूठी….।’
-पहली बार मीतू फफक-फफक कर रो पड़ी थी।
अतुल की हथेली की पकड़ मिताक्षरा की कलई पर सख्त होती गई,उसकी सारी चूड़ियाँ टूट गई थी। लहू की बूंदें नीचे टपक रही थी।
मिताक्षरा ने दर्द को सहन करने के लिए दांत होंठ पर गड़ा दिए थे।
अतुल को उसकी कलई एक विधवा की मानिंद दिखाई दी।

                                                                                                          #संदीप तोमर

परिचय : 1975 में दुनिया में आने वाले संदीप तोमर गंगधाडी जिला मुज़फ्फरनगर (उत्तर प्रदेश ) से वास्ता रखते हैं एमएससी(गणित), एमए (समाजशास्त्र व भूगोल) और एमफिल (शिक्षाशास्त्र) भी कर चुके श्री तोमर कविता,कहानी,लघुकथा तथा आलोचना की विधा में अधिक लिखते हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में ‘सच के आसपास (कविता संग्रह)’,’टुकड़ा-टुकड़ा परछाई(कहानी संग्रह)’उल्लेखनीय है। साथ ही शिक्षा और समाज(लेखों का संकलन शोध प्रबंध),कामरेड संजय (लघु कथा),’महक अभी बाकी है’ (सम्पादित काव्य संग्रह), ‘प्रारंभ’ (साझा काव्य संग्रह),’मुक्ति (साझा काव्य संग्रह)’ भी आपकी लेखनी की पहचान है। वर्तमान में आप नई दिल्ली के उत्तम नगर में रहते हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।