संवैधानिक शक्तियों के आईने  में  भारत का राष्ट्रपति

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भारत के वर्तमान  राष्ट्रपति  प्रणब  मुखर्जी  का कार्यकाल  २४ जुलाई  को समाप्त  हो रहा है। १४ वें राष्ट्रपति  के चुनाव  की प्रक्रिया आरंभ  हो चुकी है। एनडीए ने रामनाथ  कोविंद  को अपना उम्मीदवार  बनाकर दलितों  का  दिल जीतने और देश को एक संदेश  देने का प्रयास  किया है। इससे पूर्व के.आर.नारायण  दलित राष्ट्रपति  हो चुके हैं। १७ विपक्षी दलों  ने श्री कोविंद के सामने मीरा कुमार को उम्मीदवार बनाकर अपने इरादे स्पष्ट ?कर दिए हैं। हालाँकि राष्ट्रपति का चुनाव राजनीतिक दलों  के बीच संख्या बल का खेल होने से  एनडीए उम्मीदवार  की जीत तय मानी जा रही है।
भारत के राष्ट्रपति को संविधान द्वारा जो शक्ति प्रदान की गई है,उसके मद्देनजर  यह बात बहुत मायने रखता है कि,राष्ट्रपति  पद पर काबिज  होने वाले व्यक्ति की योग्यता,अनुभव और पृष्ठभूमि  क्या रही है। एक आमधारणा यह भी है कि,भारत का राष्ट्रपति  महज एक रबर मुद्रा से अधिक  कुछ नहीं है। राष्ट्र  से संबंधित  सभी जरूरी  फैसले तो प्रधानमंत्री ही लेता है। राष्ट्रपति  को तो सिर्फ उन पर हस्ताक्षर  ही करना होते हैं ,लेकिन पूर्व  राष्ट्रपतियों के कार्यकाल  पर दृष्टि  डालें  तो यह तथ्य  उभरकर सामने  आता है कि,यदि राष्ट्रपति  चाहे तो अपनी संवैधानिक  मर्यादाओं  में  रह कर बहुत  कुछ ऐसा कर सकता है जो उसकी औपचारिक छवि को एक सक्रिय राष्ट्र  प्रमुख  बनाने के लिए पर्याप्त है। यह राष्ट्रपति के विवेक पर  निर्भर करता है कि,वह परम्परा की पंक्ति  पर चलकर संविधान  का संरक्षण करे,अथवा अपने विवेक का इस्तेमाल  कर मिसाल कायम करे।
२६ जनवरी १९५० को अस्तित्व  में आए संविधान के मुताबिक  हमने अपने लिए संसदीय प्रजातंत्र  के साथ संप्रभु लोकतांत्रिक  गणराज्य  को चुना। गणराज्य  का मतलब  ही होता है कि, ऐसा राज्य जिसका मुखिया अर्थात् राष्ट्रपति  चुना हुआ  होगा। अगर हम चाहते तो डॉ.भीमराव आम्बेडकर द्वारा  बनाए  गए संविधान  में  भारत के लिए  ब्रिटेन के  राजा या सम्राट  की तरह एक परम्परा आधारित  शक्ति  शून्य  राष्ट्रपति व्यवस्था का चयन कर सकते थे,लेकिन हमने ऐसा नहीं किया। ब्रिटेन  के  सम्राट  की अधिकार शून्यता को लेकर यह कहावत प्रचलित  है कि,यदि उसके सामने स्वयं  की मृत्यु  के फरमान  का प्रस्ताव  भी लाया जाए तो उसके पास उस पर हस्ताक्षर  करने के अलावा  कोई  विकल्प  शेष नहीं  है। दूसरी  तरफ अध्यक्षात्मक  शासन प्रणाली  वाले अमेरिका  के राष्ट्रपति  का उदाहरण सामने हैं,जिसमें राष्ट्र  की संपूर्ण  शक्ति इस हद तक एक व्यक्ति में समाहित कर दी गई  है कि,वह जब चाहे निरंकुश या तानाशाह बन जाए। इन दो विरोधाभासी राष्ट्र अध्यक्षों  के बीच भारत को एक ऐसे मध्यम राष्ट्र प्रमुख की जरूरत  थी,जो न तो ब्रिटिश सम्राट की तरह महज हस्ताक्षर  करने वाली कठपुतली हो और न ही अमेरिका के राष्ट्रपति  की तरह तानाशाह हो। इसी को ध्यान  में  रखते हुए संविधान  के अनुच्छेद ५२ के अनुसार भारत के लिए एक ऐसे राष्ट्रपति की व्यवस्था की गई ,जो राष्ट्र का अध्यक्ष और प्रथम नागरिक होगा। अनुच्छेद ५३ के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में विहित होगी। वह इसका उपयोग  संविधान  के अनुसार स्वयं या अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करेगा। इसकी अपनी सीमाएँ  भी हैं। ४२ वें  संविधान  संशोधन  के अनुसार  राष्ट्रपति  को प्रधानमंत्री  की अध्यक्षता  वाली  मंत्री  परिषद  की सलाह अनुसार  चलना होगा,जबकि ४४ वें संविधान संशोधन में अनुच्छेद ७४ के पाठ को बदलकर राष्ट्रपति  को मंत्री  परिषद  द्वारा  दी गई सलाह  को पुनर्विचार  के लिए लौटाने का अधिकार भी प्रदान  किया गया है,लेकिन दूसरी बार मिली सलाह  को मानने के लिए वह बाध्य होगा। व्यावहारिक दृष्टि से राष्ट्रपति का पद भले ही औपचारिक हो,लेकिन संवैधानिक दृष्टि से वह अत्यंत शक्तिशाली है। ब्रिटेन का संविधान अलिखित और परंपराओं पर आधारित होने से वहां राजा या सम्राट को वे शक्तियाँ  प्राप्त  नहीं  है,जो भारत के राष्ट्रपति  को है। भारत  का संविधान  लिखित  होने से यहाँ प्रधानमंत्री  और राष्ट्रपति  के संवैधानिक संबंधों और अधिकारों  को स्पष्ट परिभाषित  किया गया है। व्यावहारिक रूप से देश को संचालित करने का काम भले ही  प्रधानमंत्री और उनकी मंत्री परिषद  के जिम्मे हो,लेकिन राष्ट्रपति को जो संवैधानिक शक्तियाँ  प्रदान की गई है,अगर कोई राष्ट्रपति उसका इस्तेमाल कर ले तो स्थिति एकदम उलट हो सकती है। राष्ट्रपति  संसद भंग कर सकता है,प्रधानमंत्री  को बर्खास्त  कर सकता है और सेना के प्रमुख  कमांडर के रूप में  किसी भी तरह की आंतरिक अशांति या युद्ध  की परिस्थिति  से निपटने की वह सामर्थ्य रखता है। प्रतिनिधित्व की दृष्टि से भी उसका चुनाव लोकसभा,राज्य सभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुने हुए जनप्रतिनिधियों  के मत मूल्य के आधार पर होता है,जबकि प्रधानमंत्री का चुनाव लोकसभा के बहुमत दल के चुने हुए जनप्रतिनिधियों द्वारा ही होता है। राष्ट्रपति द्वारा ली जाने वाली शपथ का प्रारूप ही अपने-आपमें उसके शक्ति सम्पन्न होने का प्रमाण है,जिसमें उसे संविधान और विधिक परिरक्षण ,संरक्षण और जनकल्याण  का दायित्व सौंपा  गया है।
पूर्ववर्ती  राष्ट्रपतियों ने अनेक अवसरों  पर यह साबित  किया  है कि,भारत  का राष्ट्रपति  एक रबर मुद्रा नहीं,वरन अपने विवेक  से कार्य  करने वाला एक सक्रिय राष्ट्र  प्रमुख  है। पूर्व  राष्ट्रपति के.आर.नारायण ने १६ फरवरी १९९८  को एक स्कूल  के मतदान केन्द्र में  मतदान  कर इस परम्परा  को तोड़ा कि भारत का राष्ट्रपति चुनाव में  मतदान  नहीं  करता है। इस तरह उन्होंने  प्रथम  नागरिक  अर्थात्  राष्ट्रपति रहते हुए  भी आम आदमी  बने रहने की मिसाल  कायम की,जो उनके पूर्व  के राष्ट्रपति  नहीं  कर पाए। यही नहीं,अपनी शक्तियों के विवेकसम्मत  इस्तेमाल  को भी उन्होंने  व्यावहारिक  रूप प्रदान  कर अपनी क्रियाशीलता  का परिचय  दिया। अपने कार्यकाल  के दौरान  इन्द्रकुमार गुजराल  और अटलबिहारी  वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते श्री नारायण को दो बार संसद भंग करने का निर्णय लेना पड़ा। त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति  में  जहाँ पूर्ववर्ती  राष्ट्रपति  नीलम  संजीव  रेड्डी ,आर.वेंकटरमन और डॉ.शंकरदयाल  शर्मा  ने पूर्व परंपराओं का पालन  करते हुए  सबसे  बड़े  दल अथवा  चुनाव  पूर्व  गठबंधन को सरकार बनाने  के लिए आमंत्रित  किया,वहीं श्री नारायण ने प्रधानमंत्री की नियुक्ति  के संबंध  में नया उदाहरण पेश किया। यदि किसी दल अथवा चुनाव पूर्व गठबंधन को बहुमत प्राप्त  होता है,तो किसी व्यक्ति  को प्रधानमंत्री तभी बनाया जा सकता है,जब वह राष्ट्रपति  को यह विश्वास  दिलाने  में  सफल  हो जाए कि  उसके पास सदन में  बहुमत  है और वह इसे साबित  कर सकता  है। यही नहीं, २२ अक्टूबर १९९९ को  इन्द्रकुमार गुजराल  सरकार   द्वारा  उत्तरप्रदेश  की कल्याणसिंह  सरकार  को बर्खास्त  कर राष्ट्रपति  शासन  लगाने और  २५ सितम्बर १९९४  को अटलबिहारी वाजपेयी  सरकार  द्वारा  बिहार  की राबड़ीदेवी  सरकार  को बर्खास्त  कर राष्ट्रपति  शासन  लगाने  की प्रधानमंत्री की सलाह  को पुनर्विचार  के लिए लौटाकर  के.आर.नारायण  ने एक महत्वपूर्ण  दृष्टांत  पेश किया,ताकि  संघीय  व्यवस्था  में  राज्य  सरकारों  की सुरक्षा भी संभव  हो सके। १९९९ में कारगिल युद्ध के समय  कार्यवाहक  प्रधानमंत्री  अटलबिहारी  वाजपेयी  को राज्यसभा  का अधिवेशन  बुलाने की  सलाह  देकर  श्री नारायण  ने  फिर एक मिसाल  कायम  की,जबकि  इस तरह  का कोई  पूर्व  उदाहरण  नहीं  था कि सरकार  नहीं  होने  की स्थिति  में  राज्य सभा  का सत्र  बुलाकर स्थिति  पर विचार-विमर्श  किया  जाए। कारगिल  युद्ध  के शहीदों  को श्रद्धांजलि  देने की बात हो या राष्ट्रपति  रहते हुए किसी देवस्थान  या ईबादतगाह  पर  नहीं  जाने का स्व बंधन श्री नारायण ने अपनी कार्यप्रणाली से जहाँ  स्वयं  को पूर्ववर्ती  राष्ट्रपतियों  से अलग प्रस्तुत  किया,वहीं  कार्यवाहक राष्ट्रपति होने की मिसाल  भी पेश की। इसी तरह ज्ञानी जेलसिंह  ने  स्वतंत्रता  संग्राम  सैनानियों  की पेन्शन और शहीद उधमसिंह  की अस्थियां भारत  मंगवाकर तथा इन्दिरा  गाँधी  के वफादार  होने के बावजूद  राजीव गांधी  की सलाह को ठुकरा कर यह साबित  कर दिया कि यदि,राष्ट्रपति  चाहे तो अपनी मर्यादा  में  रहकर बहुत  कुछ  ऐसा कर सकता है,जो उसके शक्ति  संपन्न  होने का अहसास  कराने  के लिए  पर्याप्त  हो। डाॅ.एपीजे अब्दुल  कलाम  ने पीपुल्स प्रेसीडेंट  बनकर और प्रणब  मुखर्जी  ने सहिष्णुता  और भारत  की अनेकता में  एकता  की संस्कृति  को लेकर  समय-समय  पर दिए गये अपने वक्तव्यों से यह साबित किया है कि,भारत के राष्ट्रपति  का पद महज अलंकारिक नहीं,वरन व्यावहारिक  दृष्टि से भी शक्ति संपन्न और निर्णय लेने की दृष्टि  से भी सामर्थ्यवान  है।

                                                                                         #डॉ. देवेन्द्र  जोशी

परिचय : डाॅ.देवेन्द्र जोशी गत 38 वर्षों से हिन्दी पत्रकार के साथ ही कविता, लेख,व्यंग्य और रिपोर्ताज आदि लिखने में सक्रिय हैं। कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हुई है। लोकप्रिय हिन्दी लेखन इनका प्रिय शौक है। आप उज्जैन(मध्यप्रदेश ) में रहते हैं।

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Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।