अलगाववाद पर नकेल कसने की जरूरत

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mukesh sing

जम्मू-कश्मीर के नौहट्टा में मस्जिद के बाहर ड्यूटी में तैनात पुलिस अधिकारी को कुछ उपद्रवियों की भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला। मारे गए अधिकारी अयूब पंडित की गलती बस इतनी-सी थी कि,उन्होंने मस्जिद के बाहर खड़े होकर अपनी ड्यूटी पूरी निष्ठा से निभाने की कोशिश की थी। अपनी ड्यूटी के दौरान वे किसी भी तरह के संभावित दंगे की स्थिति से निपटने के लिए पहले से ही सतर्क होना चाह रहे थे और इसी क्रम में उन्होंने मस्जिद के आस-पास हो रही सभी तरह की गतिविधियों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर दिया था।उनकी यह सक्रियता वहां खड़ी भीड़ को नागवार गुजरी, जिसके परिणामस्वरूप वहां खड़े उपद्रवियों के झुंड ने बिना किसी पूर्व चेतावनी के ही उन पर अचानक हमला बोल दिया। हमला भी ऐसा कि,पीट-पीट कर उनकी जान ही ले ली। उनकी हत्या के दौरान हमलावरों ने उनके कपड़े तक फाड़ डाले। उन्हें यातनाएं दी और फिर क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए उनकी हत्या कर दी। ऐसे में अब सवाल यह उठता है कि आखिर मस्जिद में उस वक्त ऐसा क्या चल रहा था जिसे लेकर डीएसपी अयूब विशेष तौर पर सतर्क हो गए थे? मस्जिद में आखिर ऐसी कौन-सी योजना बनाई जा रही थी जिसका संदेह होने पर डीएसपी अयूब की इतनी बेरहमी से हत्या कर दी गई?

इस संदर्भ में अगर समाचार एजेंसियों की मानें तो उस रात हुए इस दुखद वारदात से पहले शबे कद्र के मौके पर विशेष नमाज के पर उक्त मस्जिद में कुख्यात भारत विरोधी अलगाववादी नेता मीरवाइज पहुंचा था,जो नमाज के बहाने कोई संदेहास्पद योजना बना रहा था। योजना भी ऐसी जिसकी भनक ने एक पुलिस स्धिकारी की जान तक ले ली। इतना ही नहीं,बल्कि इस पूरी वारदात के दौरान भी वो वहीं मस्जिद के अंदर ही मौजूद था। मीरवाइज नाम के उस अलगाववादी नेता की उपस्थिति ने वहां खड़ी भीड़ को इतना अधिक उत्साहित कर दिया था कि,उन्होंने बिना किसी भूल के ही नमाजियों की सुरक्षा के लिए तैनात एक डीएसपी की हत्या कर दी। हत्या के दौरान भीड़ ने जो वहशीपन दिखाया है,उस पर गौर करें तो सहज ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि,कहीं-न-कहीं उपद्रवियों को मीरवाइज और उसके संगठन का संरक्षण प्राप्त था। जो उन्हें कुछ भी कर गुजरने की प्रेरणा दे रहा था। अन्यथा बिना किसी राजनीतिक संरक्षण के  ड्यूटी पर पुलिस अधिकारी की हत्या का जोखिम उठाना आम लोगों के लिए भी इतना सहज नहीं होता,जितना मीरवाइज के गुण्डों ने दिखाया था। फिलहाल नौहट्टा की इस घटना ने जम्मू-कश्मीर की वर्तमान परिस्थिति की ओर इशारा करते हुए हमारे हुक्मरानों को सचेत किया है कि,अब वो समय आ गया है जब राजनीतिक संरक्षण प्राप्त इन अपराधियों पर हमें सख्ती दिखानी होगी। उन पर सख्त कारवाई करते हुए देश में अमन-शांति का माहौल बनाना होगा,जिससे विकास की रफ्तार को गति दी जा सके। इस घटना ने जहां एक ओर पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है ,वहीं प्रदेश की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस हत्याकांड के खिलाफ कड़ी कारवाई करने के वजाए उपद्रवियों को हल्की चेतावनी देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है। देश को हिलाकर रख देने वाले इस हत्याकांड के विरूद्ध पुलिस ने मामला दर्ज तो कर लिया है,पर इस हत्याकांड के असली गुनाहगार को वो छू भी पाएगी,इस बात पर संदेह बरकरार  है। मीरवाइज जैसे ये अलगाववादी नेता हमारे देश के नेताओं के संरक्षण में पूरी तरह से सुरक्षित हैं। फिर पाकिस्तान से मिलनेवाला बेशुमार पैसा हमारे अपाहिज तंत्र से उन्हें बचाने के लिए पहले से ही तैयार बैठा है।

ये हमारे देश का दुर्भाग्य ही है,जो संसार के सबसे बड़े बेईमानों ने इसी धरा पर जन्म लिया है और वे अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। शायद यही वजह है कि,इस देश को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने वाले मीरवाइज,सैयद अली शाह गिलानी,यासीन मलिक जैसे गद्दार बेरोक-टोक पाकिस्तान से हर तरह की मदद लेकर घाटी को अशांत करने की कोशिश करते रहे हैं। अपने इसी षडयंत्र के तहत वे हमारे जवानों पर हमले का प्रयास करते आए हैं।  ये वही नेता हैं,जिन्होंने धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर को मौत का समंदर बना दिया है। जहां आए दिन अक्सर सेना और पुलिस के जवानों पर जानलेवा हमले की कोशिश की जाती है और इन हमलों में शहीद होने वाले जवानों के मृत शरीर के साथ अमानवीय बर्ताव किया जाता है। इतना सबकुछ होने बाद भी ये सभी कुसूरवार हमारे नेताओं के संरक्षण के कारण सुरक्षाबलों के हाथों से बच निकलते हैं,और समय-समय पर अपने मंसूबों को अंजाम देते हुए घाटी को अशांत कर रहे हैं। वे अपनी इन कायराना हरकतों से लोगों के दिलों में खौफ पैदा करना चाहते हैं,ताकि घाटी में उनकी हुकूमत चलती रहे। ये अलगाववादी जान बूझकर हमारी सेना को निशाना बनाते हैं,ताकि आम लोगों को अंधेरे में रखा जा सके और घाटी पर उनकी बादशाहत कायम रहे। इतना सबकुछ होने के बावजूद हमारी सरकारें इनके खिलाफ सख्त नहीं होती और न ही इनके खिलाफ कोई कार्रवाई करती है,बल्कि इन सबसे उलट हमारे कुछ नेता इन अलगाववादियों की जी-हुजूरी करते हुए नजर आते हैं। इनकी चापलूसी तक करते हैं। यही वजह है कि जिस सेना को ये एहसानफरामोश गालियां बकते हैं,उसी सेना के जवानों को उनकी सुरक्षा में तैनात कर दिया जाता है। इस तरह की  खुशामद पाकर इनका हौंसला और अधिक बढ़ जाता है और फिर ये दोगले अलगाववादी नेता हमारे देश को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से अधिक सक्रिय हो जाते हैं,क्योंकि उन्हें ये बात स्पष्ट पता होती है कि,जब तक उनके पास पैसे की ताकत है तब तक इस देश का लचर कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है,और वे इस देश में बिल्कुल सुरक्षित हैं।

वैसे समय के हिसाब से हमें अब यह सोचना होगा कि आखिर हमारे देश में ऐसी लचर कानून व्यवस्था क्यों बनाई गई है जो देश को इस हद तक नुकसान पहुंचा रही है? समय के साथ हमें यह विश्लेष्ण करना होगा कि,आखिर बोलने की आजादी के कानून के नाम पर देश के विरूद्ध बोलने वालों को कब तक बचाया जाएगा? वैसे अब तक जो भी हुआ हो,उसे जाने दीजिए,पर अब तो देश के अस्तित्व की रक्षा के लिए हमें अपने संविधान और कानून में बदलाव की जरूरत है। अब दरकार है देश के गद्दारों पर कसकर नकेल कसने की। अब समय आ गया है जब अलगाववाद की कमर तोड़कर उन्हें ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया जाए,जहां से वे फिर कभी इस देश को नुकसान पहुंचाने के बारे में सोच न सकें। अब जरूरत है तो खुद को सजग और सक्षम बनाने की,जिससे इस देश में फिर कभी कोई और मीरवाइज या यासीन भटकल जैसे लोग ही पैदा न हों,जिनसे इस देश को खतरा है या जो इस देश को नर्क की राह पर ढकेलते हैं। अब आवश्यकता है तो हमारी सरकारों और सभी दलों को एकत्रित होकर एक ऐसी व्यवस्था बनाने की,जिसके बारे में सोचने भर से भारत विरोधी ताकतों की हालत पतली हो जाए। हमें जरूरत है आपस में मिलकर आतंकवाद और अलगाववाद का संपूर्ण अंत करने की,ताकि हमारे इस देश में शांति और सुकून का फूल खिलाकर इस देश को विकास की बुलंदियों के शिखर पर स्थापित किया जा सके और संसार में शांति-सृमद्धि के अगुवा रूप में भारत पूरे विश्व का नेतृत्व कर सके।

                                                                                        # मुकेश सिंह
परिचय: अपनी पसंद को लेखनी बनाने वाले मुकेश सिंह असम के सिलापथार में बसे हुए हैंl आपका जन्म १९८८ में हुआ हैl 
शिक्षा स्नातक(राजनीति विज्ञान) है और अब तक  विभिन्न राष्ट्रीय-प्रादेशिक पत्र-पत्रिकाओं में अस्सी से अधिक कविताएं व अनेक लेख प्रकाशित हुए हैंl तीन  ई-बुक्स भी प्रकाशित हुई हैं। आप अलग-अलग मुद्दों पर कलम चलाते रहते हैंl 
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।