
अक्षरों की आराधना से
शब्दों का सामर्थ्य बनता है,
और वही शब्द मिलकर
अभिव्यक्त करते हैं
मन के प्रकाश को,
मनोभावों को,
संवेदना और सत्य को,
शाश्वत और अटल को,
जागरण और अभिव्यक्ति को,
जन की पीड़ा को,
मानस के संवेग को,
प्रेम को, विरह को,
शृंगार को, आह्लाद को,
ओज को, करुण को,
सहज को, गुस्से को,
राष्ट्र तत्व को, विपक्ष को,
लाल और पीले को,
नीले और काले को,
हर मन की उज्ज्वला को,
कीर्ति की प्रज्जवला को।
इसे ही लोग प्यार से
कविता कहते हैं।
है न….?
[विश्व कविता दिवस की हार्दिक शुभेच्छाएँ]
डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
राष्ट्रीय अध्यक्ष, मातृभाषा उन्नयन संस्थान, भारत

