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ये न पूनम का चाँद है,
न ईद का चाँद है।
हाँ, ये मेरे सुहाग चौथ का चाँद है।
इन हाथों की हरी मेहंदी सूख कर ,
मेरे चौथ के चाँद-सी सुर्ख़ लाल हो जाएगी,
मेरी माँग भी सुर्ख़ सिंदूर से भरी जाएगी।
हाथों में भी लाल चूड़ियाँ
संगीत-सी खनकेगी,
जब इन हाथों से पूजा की
थाली सजाई जाएगी।
जब वो सुर्ख़ चाँद
सुहागिनों की छत पर आएगा,
तब हर चेहरा मुस्कराएगा।
और जब पिया पानी पिलाएगा,
तब ये व्रत पूरा कहलाएगा।
कीर्ति सिंह गौड़,
इन्दौर, मध्यप्रदेश
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