यात्रा चित्र- दांडी यात्रा

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हमारी दांडी यात्रा

सुबह जल्दी उठने से मेरा कोई विशेष लगाव नहीं है इसलिए जब मुझे बताया गया कि सूर्योदय के समय दांडी भ्रमण का विशेष आनंद है तो मैंने पूछा कि लगभग वैसा ही आनंद सूर्यास्त के समय नहीं रहता होगा? संतोषजनक स्पष्टीकरण ना मिलने से हमने दांडी शाम को ही जाना उचित समझा।

दांडी नवसारी जिले में समुद्र किनारे बसा एक छोटा सा गांव था। गांव अभी भी छोटा ही है लेकिन अब ख्याति बहुत बड़ी है। किसी एक व्यक्ति के सिर्फ कुछेक दिन ठहरने से गांव अमर हो सकता है, दांडी उसका सजीव उदाहरण है।

दांडी में हमें कालू भाई जी मिले। बड़े गांधीवादी और निस्वार्थ भाव से सभी को दांडी की घटनाएं बताने और स्मारक का भ्रमण कराने वाले। कालू भाई के साथ हम सबसे पहले सैफी विला गए जो बोहरा समाज के सैयदना साहब का हुआ करता था। सन् 1930 के लिहाज से समुंदर की ओर झांकता हुआ एक आलीशान निर्माण। बताते हैं कि उन्होंने गांधी जी से अनुरोध किया था की दांडी प्रवास के दौरान वे सैफी विला में ही रुके। गांधीजी ने अंग्रेजी हुकूमत के मद्देनजर उन्हें पुनर्विचार करने की सलाह देते हुए कहा कि उनके रहने के बाद शायद वह विला सैफुद्दीन साहब के पास नहीं रह पाएगा। कहने की जरूरत नहीं है कि गांधीजी सैफी विला में ही रुके। जिसके पास खोने को बहुत कुछ हो वह क्रांति, आंदोलनों से दूर ही रहता है। हम सिर्फ कल्पना करके उनकी प्रशंसा ही कर सकते हैं कि वह निर्णय सैयदना साहब के लिए कितना शौर्य पूर्ण रहा होगा।
इसके बाद हमने राष्ट्रीय नमक सत्याग्रह स्मारक देखना प्रारंभ किया। गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी की 390 किलोमीटर की यात्रा 24 दिनों में पूरी की थी उसके प्रतीकात्मक 24 भित्तिचित्रों (म्युरल) के माध्यम से दांडी यात्रा की महत्वपूर्ण घटनाओं को दिखाया गया है। म्युरल इतने सजीव की एक म्युरल पर बैठा गिरगिट भी हमें म्यूरल में कलाकार द्वारा बनाया हुआ एक पहलू ही लगा।
कालू भाई ने बताया कि गांधीजी सोमवार का मौन व्रत होने से उस दिन को यात्रा नहीं करते थे अतः 24 दिनों में 21 दिन गांधी जी की यात्रा चली थी। मैं सोचने लगा कि चैत के गरम महीने में 60 वर्ष की उम्र में प्रतिदिन लगभग 20 किलोमीटर चलना अपने आप में एक आश्चर्य ही है। और फिर गांधीजी चलते भी ऐसे थे मानो भाग ही रहे हो, मानो काम खत्म करने की जल्दी हो, मानो बाकी यात्रियों से कोई रेस लगाई हो।

उन भित्तिचित्रों के बाद वहां 80 प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। उन लोगों की जिन्होंने गांधी जी के साथ आदि से अंत तक यात्रा की थी। देश विदेश के प्रसिद्ध मूर्तिकारों द्वारा बनाई हुई। आदम कद। यात्रा करते हुए की मुद्रा में। जिसमें सबसे आगे गांधीजी हैं। सर पर रुमाल है और चेहरे पर हंसी। दोनों ही चीजें गर्मी भगाने को- एक तन की और एक मन की।

कालू भाई ने बताया कि पहले इन सभी मूर्तियों के बीच से निकलने की अनुमति थी। उद्देश्य था कि शायद दांडी की वह यात्रा कुछ तो अनुभवगम्य हो पाएगी। लेकिन फिर कुछ लोगों ने उन मूर्तियों के कंधों पर बच्चे बैठा कर फोटो सेशन शुरू कर दिया। और सही भी है- दो कारणों से। एक तो कि जैसे गांधी जी नमक कानून तोड़ने के उद्देश्य से दांडी आए थे वैसे ही वे लोग फोटो खिंचवाने के उद्देश्य से दांडी आए थे। फिर दांडी में आए और उद्देश्यपूर्ति ना हो, ऐसा हो नहीं सकता। दूसरा गांधी जी ने आजादी दिलाई ही इसलिए थी की हर बात की स्वतंत्रता बनी रहे। तो फिर फोटो खींचने की स्वतंत्रता भी रहनी चाहिए। खैर फिलहाल मूर्तियों के बीच में रमण करने की सुविधा बंद थी।
उन मूर्तियों के अवलोकन के दौरान कालू भाई ने बताया कि गांधी जी के 80 चुने हुए यात्रियों में सबसे छोटा व्यक्ति 16 वर्ष की उम्र का था। हम आश्चर्य में थे कि भला यह भी कोई उम्र हुई। उसमें क्या समझदारी होगी? लेकिन फिर लगा कि जैन धर्म के आधार से जब व्यक्ति 8 वर्ष की उम्र में विवेकी होने से सम्यक बोधि प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है तो फिर यह तो उससे दोगुनी उम्र है। और यह भी कि व्यक्ति को अपनी उम्र से कम उम्र के लोग हमेशा नासमझ ही लगते हैं। 25 वर्ष वाले को लगता है कि 25 ही समझदारी की उम्र है और 60 वर्ष वाले को लगता है कि रिटायरमेंट के पहले सभी नासमझ होते हैं। बहरहाल गांधी जी ने उनको चुना था तो अवश्य ही तर्कसंगत चुनाव रहा होगा।
आगे गांधीजी की एक विशालकाय मूर्ति स्थापित की गई थी जिसके ऊपर दो हाथ एक वर्गाकार स्फटिक क्रिस्टल को थामे हुए थे जो नमक के कण का प्रतीक था। हमें पता चला कि जिस दिन गांधी जी को नमक कानून तोड़ना था उस दिन प्रातः 4:00 बजे लोग समुद्र के किनारे पहुंचकर भजन कीर्तन कर ऐतिहासिक क्षण की भूमिका तैयार कर रहे थे। मैं इस सोच में था कि नींद से ऐसी क्या ही दुश्मनी! सुबह आराम से सो कर उठते फिर चले जाते। समुंदर की रेत से नमक ही तो अलग करना था। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि उस समय के माहौल, अंग्रेजों के निर्णय को लेकर अनिश्चितता, ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनने के अवसर ने सभी के सीने को फुला दिया होगा, एक जोश भर दिया होगा। शायद रात में भी कितने लोग कई संकल्प-विकल्पों में ही उलझे रहे होंगे।

6 अप्रैल, 1930 को दांडी धन्य हो गई। 390 किलोमीटर की यात्रा में पड़े वह 21 पड़ाव धन्य हो गए (जहां शासन द्वारा यात्री निवास भी बनाए गए हैं)। दांडी के लिए जब गांधीजी साबरमती आश्रम से चले थे तो कृत संकल्पित हुए थे कि स्वराज प्राप्त करके ही साबरमती आश्रम वापस लौटेंगे। दांडी यात्रा के विसर्जन के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन देश में शुरू हो गया। गांधीजी गिरफ्तार कर लिए गए। दांडी के पास आपातकालीन परिस्थितियों में ट्रेन रुकवाकर उन्हें पुणे के लिए रवाना किया गया। गांधीजी फिर जीवन पर्यंत साबरमती आश्रम नहीं जा पाए।
कालू भाई ने बताया कि हमारे आने के एक दिन पहले ही एक व्यक्ति ने दांडी से साबरमती की यात्रा शुरू की है। 24 दिनों में 390 किलोमीटर। बिल्कुल वैसे ही। बस उलट। साबरमती आश्रम पहुंचकर शायद गांधी जी की प्रतिमा के सामने यह संदेश देगा कि बापू आपका स्वराज हम सबको मिल गया है।
स्मारक के 24 भित्तिचित्रों में एक की व्याख्या यह है कि एक 105 वर्ष की वृद्ध महिला गांधी जी को “विजयी भव” का आशीर्वाद दे रही है। इस बात की संभावना नगण्य है कि वे माताजी 1947 की स्वतंत्रता देख पाई होंगी लेकिन दांडी मार्च की सफलता ने उन्हें आजादी जैसी ही खुशी दी होगी।

अगम जैन (आईपीएस)
भोपाल, मध्यप्रदेश

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