‘नवोदय’: एक सलाह

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मखमली घास पर मखमली जूते पहने, सिर पर हरे -भरे पत्र- छत्र छाँह लिए, आकाश की तिलस्मी दुनिया की ओर दृष्टि गढ़ाए हमारा कर्णधार अपनी ही धुन, अपने ही सुख में लीन,बेपरवाह बढ़ता चला जा रहा है….।जहाँ है सपनों की रुपहली,चकाचौंध से भरी दुनिया…।एक उड़ान..सपनों को पाने की चाहत।
सपनों को पाने की चाहत बुरी नहीं।बुरा है तो दृष्टिकोण..।संकीर्ण ,संकुचित दृष्टिकोण और सीमित ,अपर्याप्त प्रयास।
जब नन्हे बालक यथार्थ के कठोर धरातल से कोसों दूर, बहुत दूर… दूर पहुँच, चाँद को पाना चाहते हैं, जब पाँव के नीचे ज़मीन नहीं होती और उड़ने के लिए पंख भी नहीं, तो इस क्रिया की परिणति क्या होगी? गिरे मुँह के बल ‘धड़ाम’..!अधोगति ! पतन!
उफ्फ! नहीं सहन कर पाता वह यह चोट।जब उसने अपने शरीर पर एक खरोंच नहीं देखी,न ही कभी झेली पैरों की फटी बिवाई की पीर ,नहीं देखा कभी खुरदरे हो आए हाथों की खुरदुरी काली लकीरों को। नहीं देखा कभी स्वदेह को स्वेद बिंदुओं से दमकते हुए।और न ही कभी आँखों ने आर्द्रता को अनुभव किया।
तब हम कैसे गढ़ पाएँगे लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को, कर्मवीर शास्त्री जी को, सादगी की प्रतिमूर्ति राजेंद्र बाबू को?कैसे बाँध पाएँगे इन्हें माटी की गंध से? जब इन्होंने अपनी देह को कभी माटी से अलंकृत ही नहीं किया।फिर कैसे होगा मातृ -भूमि की रज से मोह ?फिर कैसे होगा सिर पर कफन बाँध देश पर सर्वस्व न्यौछावर करने का भाव?
ओह! यह क्या?हम कैसी पौध तैयार कर रहे हैं?जिसे कभी ज़मीनी वातावरण-प्राकृतिक खाद,हवा, पानी का सुख मिला ही नहीं।जो कृत्रिम वातावरण में पली- बढ़ी ,जो धूप-घाम ,
वर्षा-जाड़े का अनुभव करने से वंचित है।जिसकी देह में वह शक्ति ही नहीं जो भारत के भरत में थी,वह इंद्रिय निग्रह ही नहीं जो ‘बुद्ध ‘बने सिद्धार्थ में था। वह आत्मविश्वास, आत्मशक्ति ही नहीं जो भारत के ‘लाल’-लाल बहादुर में थी।वह साहस ही नहीं जो भारत के ‘सिंह’ भगत में था।
कहाँ चूक हुई ? क्या हो गया वीर प्रस्विनी भारत माँ के पूतों को? क्यों आज भारत अपत्य हुए ,तन से ,मन से अशक्त -कमजोर?
शायद कारण है बदलता परिवेश। पाश्चात्य भोगवादी संस्कृति की ऐसी आँधी चली कि भारतीय संस्कृति-वट- वृक्ष समूल धराशायी हो गया है और आज हमारी भाषा ,लिपि अपने प्राण, काया स्वास्तित्व संघर्ष में समूल नष्ट हो अंतिम सांसे गिन रहे हैं। ओह!!
रीढ़ की हड्डी विहीन, भाषा-लिपि विहीन हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं?क्यों न हम शुष्क हो रही उदार ,उदात्त ,
समृद्ध-संपन्न भारतीय संस्कृति -सलिला को पुनर्जीवित कर,शाश्वत जीवन -मूल्यों,जीवन- दर्शन से नित सींच-सींच ,हम क्यों न स्वस्थ, हृष्ट -पुष्ट पौध का सृजन करें? क्यों न वीर प्रस्विनी भारत माँ की गोद पुनः गौरवान्वित करें!

#यशोधरा भटनागर
पता-152अलकापुरी
देवास
म.प्र.
455001

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त्रासदी

Tue Jan 11 , 2022
सुवर्ण कानन में फलित प्राणों की स्वप्न मंजरी #डॉ सीमा भट्टाचार्य बिलासपुर (छत्तीसगढ़) #परिचय- दिल्ली पब्लिक स्कूल बिलासपुर छत्तीसगढ़ में संस्कृत विभाग में अध्यक्षा पोस्ट में कार्यरत। Post Views: 195

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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।