हाथी के दांतों की तरह का सरकारी व्यवहार

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कोरोना महामारी की दूसरी बार दस्तक होते ही सरकारों ने एक बार फिर स्वस्थ अमले पर चाबुक चलाना शुरू कर दिया है। पहले चरण की जी तोड मेहनत करने वाले धरातली कर्मचारियों पर कडाई बरतने का क्रम शुरू होते ही उनमें असंतोष की लहर दौडने लगी है। गांवों की गलियों में बिना सुरक्षा साधनों के सेवा करने वाली आशा कार्यकर्ता, संगनी कार्यकर्ता सहित अनेक स्वास्थ रक्षकों की जान एक बार फिर मौत के दरवाजे पर दस्तक देने लगी है। चन्द पैसों पर जीवन यापन करने वालों पर भारी भरकम सेलरी उठाने वाले नित नये फरमान सुना रहे हैं। कहीं कोरोना के मरीजों की संख्या में बढोत्तरी हो रही है तो कही संख्या नगण्य दिख रही है। चुनावी राज्यों सहित कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां कोरोना के मरीज होते हुए भी सरकारी आंकडों से गायब हैं। सरकारी तंत्र के अलावा समानान्तर जांच की इजाजत की कौन कहे, कोरोना से संबंधित जानकारी को भी सूचना के अधिकार से बाहर रखा गया है। ऐसे में लाल फीताशाही की आंकडों वाली दलीलें मानने पर देश मजबूर है। सूत्रों की मानें तो अनेक राज्यों में मरीजों की भारी संख्या होने के बाद भी उन्हें निरंतर नजरंदाज किया जा रहा है। अधिकारियों ने अपने अधीनस्तों को कोरोना मरीजों की संख्या में बढोत्तरी न होने के सख्त निर्देश दे रखे हैं। चुनावी वातावरण में शारीरिक दूरी का पालन करना बेहद कठिन है। महाकुंभ जैसे आयोजनों में श्रध्दालुओं की भीड गाइड लाइन को आइना दिखा रही है। मजहवी जलसों में भी नियमों की खुले आम धज्जियां उड रहीं हैं। ऐसे में कोरोना के निर्देशों को असहाय जनसामान्य पर ही लागू किया जा रहा है। पूर्व निर्धारित विवाहोत्सव, धार्मिक अनुष्ठान जैसे जन सामान्य के आयोजनों पर शासन, प्रशासन और पुलिस के नियम अपने अनुशासन की चरम सीमा पर दिख रहे हैं परन्तु सफेदपोश सत्ताधारियों और उनके खास लोगों को यह छू भी नहीं पाते। हाथी के दांतों की तरह का सरकारी व्यवहार अब आम आवाम को दिखने लगा है। सरकार की मंशा बताकर अधिकारियों का निरंकुश बर्ताव नागरिकों पर कहर बनकर टूट रहा है। जब देश की सरकारों के मध्य ही वर्चस्व की जंग खुले मैदान में हो रही हो तब चौराहे पर हंडी फूटना लगभग तय है। सत्ता हथियाने वाले सारे संसाधनों को एक साथ झौंका जा रहा है। अधिकारियों के व्दारा अनावश्यक रूप से अधीनस्तों को कोरोना के नाम पर परेशान करने और फिर राहत देने हेतु लाभ लेने की अनेक घटनायें आये दिन सामने आ रहीं है। कलम से लेकर कैमरे तक का डर भी अब अधिकारियों, राजनेताओं और अनियमितायें बरतने वालों को नहीं रहा। भैंस और लाठी का कहावत एक बार फिर चरितार्थ होने लगी है। धरातल पर काम करने वाले चन्द लोगों पर आख्या मांगने और निर्देश देने वालों की लम्बी फेरिश्त है। परिणामात्मक कार्य का दबाव, लोगों का सरकारी योजनाओं पर विरोधात्मक दृष्टिकोण और अधिकारियों की इच्छा के अनुरूप आख्या बनाने की मजबूरी के त्रिशूल से घायल होते धरातली कर्मचारी अब शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुके हैं। दूसरी ओर सरकारों से मिलने वाले फंड पर अधिकारियों की लीपापोती नीति चरम सीमा पर पहुंच चुकी है। प्रशिक्षण, भ्रमण, सर्वेक्षण जैसे अनेक कार्यों के माध्यम से आने वाले बजट का बंदरबांट हो रहा है। सब कुछ सामने होता देखने के बाद भी चंद पैसों में मिले वाली पगार पाने वाले मुंह सिलने पर मजबूर हैं, अन्यथा उन्हें वह जीवकोपार्जन के साधन से भी हाथ धोना पड सकता है। वास्तविकता तो यह है कि धरातल के सैकडों कर्मचारियों के पगार के बराबर मिलने वाली सेलरी भी आज अधिकारियों को कम लगती है तभी तो वह विभिन्न मदों के पैसों को ठिकाने लगने की जुगाड में रहते हैं। ऐसे में कोरोना का दावानल उन बडे साहबों के लिए छप्पड फाड कर पैसों की बरसात बनकर एक बार फिर आ गया है। मुसीबत तो आई हो तो केवल मध्यमवर्गीय परिवारों पर या फिर धरातल पर काम करने वाले कर्मचारियों पर। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

#डा. रवीन्द्र अरजरिया

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।