हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा में डा जियाउर रहमान जाफरी की ग़ज़ल

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ग़ज़ल को कविता की एक प्रवृति मान ली गई है. इसका कारण यह है कि हिन्दी कविता में ग़ज़ल को पढ़ने वाले और चाहने वाले बहुत लोग हैं.
हिन्दी ग़ज़ल साहित्य में जियाउर रहमान जाफरी की पहचान ग़ज़ल के एक आलोचक के तौर पर है ही, उनकी शायरी भी हमें मुतासिर करती है. बेगूसराय के मुज़फरा नामक गाँव में जन्मे श्री जाफरी ने हिन्दी ग़ज़ल से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की. उन्होंने तीन भाषाओं में स्नात्तकोत्तर किया और यू जी सी की परीक्षा उत्तीर्ण की.
हिन्दी ग़ज़ल पर आलोचना की उनकी दो किताबें काफ़ी लोकप्रिय है –
1.परवीन शाकिर की शायरी, और
2.ग़ज़ल लेखन परम्परा और हिन्दी ग़ज़ल का विकास
उसके अलावा हिन्दी ग़ज़ल पर उनका संग्रह –
1.खुले दरीचे की खुशबू
2.खुशबू छू कर आई है
भी काफ़ी चर्चे में रही. बाल साहित्य पर उनकी दो किताबें मौजूद है
1.चाँद हमारी मुट्ठी में है
2.मैं आपी से नहीं बोलती
वो पत्र पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखते हैं, उन्हें बिहार सरकार का जनशताब्दी सम्मान भी मिला है. पत्रकारिता और लेखन के साथ हिन्दी ग़ज़ल और आलोचना को भी उन्होंने समेटने का काम किया है. मैथिली में जहां उनकी ग़ज़लें पढ़ी जाती हैं, वहीं उर्दू में पावंदी से बाल साहित्य लिखने वाले वो बिहार के अकेले बाल साहित्यकार हैं.

            आपकी ग़ज़लों की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सहजता और सरलता है. भाषाई कौशल और ज़ुबान की मिठास के साथ वो एक अलग माहोल तैयार कर लेते हैं. उनका अपना एक लबो लहजा है, जो बहुत कुछ मुनव्वर राना से मिलता है. उनपर अपने पिता फज़लुर रहमान हाशमी का भी असर है जो अपनी व्यंग्य कविताओं के लिए जाने जाते थे.इस संदर्भ में डा जियाउर रहमान जाफरी की कुछ ग़ज़लों के शेर देखे जा सकते हैं... 

जमीं पे लोग जो अच्छे थे वो रहे ही नहीं
खुदा ने इसलिए ऊपर उन्हें बुलाया था
………
छुपा कर कोशिशें रखने की सब नाकाम होती हैं
तेरे आने से सारा घर मुअत्तर होने लगता है
…………
मैं तुमसे मिलने अगर चाँद पर भी आऊंगा
मुझे उम्मीद है बादल तुम्हें छुपा लेगा
…………
न जाने कौन सा जादू है जब वो फोन करता है
उबलता दूध चूल्हे पर वो लड़की छोड़ देती है
………….
हमारी मान लो छोड़ो सफर की गुंजाईश
बची हुई है अभी घर में घर की गुंजाईश
…………..
सिर्फ चाहत से कुछ नहीं होता
कुछ तो मजबूरियां भी रहती हैं
……….
जो बेज़ुबाँ थे वही चीख कर बताते थे
जो बोल सकते थे गूंगे का रोल करने लगे
…………
वक़्त कहता है कि अब घर से न निकला जाए
पर ज़रूरत है कि थमने ही नहीं देती है
…………..
मैं कितनी बार ज़िद पर जीत करके हार जाता हूं
किसी की छीन लेने से ख़ुशी अपनी नहीं होती
जाफरी के कई शेर इस बात के प्रति इत्मीनान दिलाते हैं कि संसार खूबसूरती से भरा है. कुछ शेर मुलाहिजा हो…

मुहब्बतों में कहाँ तक दग़ा किया मैंने
तमाम शख्स को अपना बना लिया मैंने
……
बस इसी डर से कि खुशबू न चुरा ले कोई
वो निकलता है तो परफ्यूम हटा देता है
……..
मैं उसके बाद फिर उसको सज़ा ही दे नहीं पाता
वो मेरे कान में सटती है सॉरी बोल देती है
…..
अमीरे शहर गरीबों पे लानतें मत कर
खुदा जो चाहे तो मंज़र बदल भी सकता है
……..
जो झुक गई मेरी गर्दन तो बच गये हम भी
वो तीर मेरे ही सर से गुज़रने वाला था
………
कहना न होगा कि हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा में जाफरी का अवदान महत्वपूर्ण है, वो इस वक़्त के नुमाइंदा शायर और ज़िम्मेदार आलोचक हैं.
………
सूफ़िया खानम
हिन्दी विभाग
भागलपुर विश्वविद्यालय भागलपुर, बिहार

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।