हल्दीघाटी:

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मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।
मातृ भूमि के रक्षक राणा,
मेवाड़ी परवाने पर।।✍

चित्रांगद का दुर्ग लिखूँ जब,
मौर्यवंश नि: सार हुआ।
मेदपाट की पावन भू पर,
बप्पा का अवतार हुआ।
कीर्ति वंश बप्पा रावल के,
मेवाड़ी पैमाने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍

अंश वंश बप्पा रावल का ,
सदियों प्रीत रीति निभती।
रतनसिंह तक रावल शाखा,
शान मान हित तन जगती।
पद्मा-जौहर, खिलजी- धोखा,
घन गोरा मस्ताने पर,।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
३.
सीसोदे हम्मीर गरजते,
क्षेत्रपाल-लाखा- दानी।
मोकल – कुम्भा – चाचा – मेरा,
फिर ऊदा की हैवानी।
कला, ग्रंथ निर्माण नवेले,
विजय थंभ बनवाने पर,
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एकलिंग दीवाने पर।।✍
४.
अस्सीे घाव लिखूँ साँगा के,
युद्धों के घमसान बड़े।
मीरा की हरि प्रीत लिखूँ फिर,
वृन्दावन भगवान खड़े।।
बनवीरी षड़यंत्र धाय सुत,
उस चंदन बलिदाने पर,
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर ।।✍
५.
भूल हुमायू, राखी बंधन,
कर्मवती जौहर गाथा।
उदय सिंह कुंभलगढ़ धीरज,
उभय हेतु वंदन माथा।
शम्स खान, फिर शहंशाह के
कायर नौबत खाने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
६.
जयमल कल्ला, फत्ता ईसर,
मुगल कुटिल अय्यार जहाँ।
वचन बद्ध घर से जो निकले,
चित्तौड़ी लौहार यहाँ ।
जौहर, साका वाले हर तन,
फिर चूँडा सेनाने पर।
मन करता है, गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍

उदयपोल से झील पिछोला,
स्वर्ग सँजोया धरती पर।
आन मान अरु शान बचाने।
गुहिल जन्मते जगती पर।
अकबर के समझौते टाले,
फतह किए हर थाने पर।
मन करता है,गीत लिखूँ मै,
एकलिंग दीवाने पर।।✍
८.
महा प्रतापी राणा कीका,
चेतक भील भले साथी।
सर्व समाजी साथ लड़ाके,
अश्व सवार सधे हाथी।
मानसिंह सत्ता अवसादी,
शक्तिसिंह नादाने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
९.
अकबर से टकराव लिखूँ या ,
मान सिंह अपघात सभी।
वन वन भटकी रात लिखूँ या,
घास की रोटी भात कभी।।
पीथल पाथल वाली बातें ,
पृथ्वीराज सयाने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
१०.
एकलिंग उद्घोष लिखूँ,जय,
पूँजा शक्ति प्रदाता की।
राणा,चेतक शौर्य रुहानी,
मान – मुगलिया नाता की।
राणा के भाले से बचते,
मानसिंह छिप जाने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
११.
बदाँयुनी बद हाल लिखूँ,या
आसफ खाँ हतभागी को।
भू, मेवाड़, सुभागी मँगरी,
मान,मुगल दुर्भागी को।
चेतक राणा दोनो घायल
मन्ना रण बलिदाने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं
एक लिंग दीवाने पर।।✍
१२.
चेतक का तन त्याग लिखूँ या,
भू – मेवाड़ी परिपाटी।
शक्ति सिंह का मेल प्रतापी,
नयन अश्रु नाला माटी।
रक्त तलाई , लाल लिखूँ या,
बस चेतक मर्दाने पर।
मन करता है, गीत लिखूँ मै,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
१३.
भीलों का सह भाग लिखूँ या,
पिटते मुगल प्रहारों को।
हाकिम खाँ की तोप उगलती,
दुश्मन पर अंगारों को।
वीर भील वर, रण रजपूते,
तोप तीर अफगाने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
१४.
अकबर की मन हार लिखूँ या,
मानसिंह जज़बातों को ।
प्रण मेवाड़ी विजय पताका,
शान मुगल आघातों को।
भामाशाही धन असि धारी,
प्रण पालक धनवाने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
१५.
चावण्ड व गोगुन्दा गढ़ की,
मँगरा मँगरा छापों को।
महा राणा की सिंह दहाड़े
चेतक की हर टापों को।
जय जय जय मेवाड़ लिखूँ या
मरे मीर मुलताने पर।
मन करता है, गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
१६.
मुगले आजम क्योंकर कह दूँ,
चंदन रज़, हल्दी घाटी।
नमन रक्त मेवाड़ धरा का,
शान मुगल धिक परिपाटी।
हल्दी घाटी तीर्थ अनोखा,
आड़े गिरि चट्टाने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
१७.
क्या छोड़ूँ क्या सोचूँ लिखना,
क्या,भूलूँ क्या, याद करूँ।
नमन लिखूँ मेवाड़ धरा को,
गुण गौरव आबाद करूँ।
नमन वंश बप्पा अविनाशी,
हर युग में सनमाने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
१८.
शीश दिए जो हित मेवाड़ी,
तपती लौ पर ताप वहाँ।
एक बार मैं शीश झुका दूँ,
चेतक की थी टाप जहाँ।
वीरों की बलिदानी गाथा,
गाते भील तराने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
१९.
बार बार मैं राणा लिख दूँ
चेतक के रण वारों को।
लिखते लिखते खूब लिखूंँ मैं,
तीर बाण असि धारों को।
मुँह लटकाए मुगल शेष जो,
प्यासे नदी मुहाने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
२०.
अमर धाम हल्दी घाटी है,
अमर कथा उन वीरों की।
चेतक संग सवार अमर वे,
अमर कथा रण धीरों की।
गढ़ चित्तौड गूँजती गीता,
रज पत्थर नर गाने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर।।✍
२१.
मन करता है लिखते जाऊँ,
मातृ भूमि की आन वही।
हिन्दुस्तानी वीर शिरोमणि,
राणा , चेतक शान मही।
शर्मा बाबू लाल बौहरा,
कब रुकता थक जाने पर।
मन करता है गीत लिखूँ मैं,
एक लिंग दीवाने पर ।।✍

नाम–बाबू लाल शर्मा 
साहित्यिक उपनाम- बौहरा
जन्म स्थान – सिकन्दरा, दौसा(राज.)
वर्तमान पता- सिकन्दरा, दौसा (राज.)
राज्य- राजस्थान
शिक्षा-M.A, B.ED.
कार्यक्षेत्र- व.अध्यापक,राजकीय सेवा
सामाजिक क्षेत्र- बेटी बचाओ ..बेटी पढाओ अभियान,सामाजिक सुधार
लेखन विधा -कविता, कहानी,उपन्यास,दोहे
सम्मान-शिक्षा एवं साक्षरता के क्षेत्र मे पुरस्कृत
अन्य उपलब्धियाँ- स्वैच्छिक.. बेटी बचाओ.. बेटी पढाओ अभियान
लेखन का उद्देश्य-विद्यार्थी-बेटियों के हितार्थ,हिन्दी सेवा एवं स्वान्तः सुखायः

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।