असल! में असली भगवान है सिर्फ़ “मां”

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इस सृष्टि की रचना करने के कारण हम सभी ईश्वर को सबसे बड़ा रचनाकार मानते है। उसी तरह मां भी इस धरा पर शिशु को नौ माह तक अपनी कोख में रख अथक पीड़ा सहन करने के उपरांत जन्म देती है अर्थात् शिशु की रचना करती है। इस प्रकार ईश्वर के कृत्य को आगे बढ़ाने में उसकी पूर्णतः सहभागिता होती है। इसीलिए मां को धरती पर ईश्वर का रूप कहते है। मां की कोख में रहने पर शिशु की पूरी संरचना होती ही है एवं जन्म के पश्चात भी मां उसकी ऐसी परवरिश करती है कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो जाये और अपने जीवन में सफलता हासिल करें। इस तरह मां सिर्फ जन्मदात्री ही नहीं अपितु उसकी पालनकर्ता भी है। मां के बिना संतान का जीवन पूर्णतया अधूरा, सूना और रुका हुआ होता है। वास्तविकता में मां हर किसी के जीवन में विशेष महत्व रखती है, इस एहसाह को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, बस महसूस किया जा सकता है।

मां का प्रथम और पूर्णतः स्पर्श:-

मां की कोख से जन्म लेने के उपरांत शिशु इस जहां में आकर स्वयं को बिल्कुल अकेला, अंजान और अधूरा पाता है। कोख से बाहर निकलते ही वह सहमा-सहमा सा रहता है, बाहर आते ही रोने लगता है। जैसे ही मां उसे अपने वात्सल्य भाव से आंचल में भरती है तो मां के स्पर्श मात्र से ही उसका डर एकदम समाप्त हो जाता है, उसे इस अनजान दुनिया में किसी अपने के होने का प्रथम और पूर्णतः अहसास मिलता है। वह पूरी तरह से आश्वस्त हो स्वयं को मां के हवाले करके गहरी नींद में चला जाता है। शुरूआत में वह केवल सोता रहता है,उसकी सारी आवश्यकताओं को मां पूरा कर देती है। बच्चे की एक सुगबुगाहट से ही मां उसकी जरूरत को तुरंत भांप लेती है और नवजात को एक क्षण के लिये भी अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देती। वह उसे रात – रातभर जागकर उसका गीला बिछौना बदलती है और उसे हर तरह से सहेजती-संभालती है, उसे बड़ा करती है। नवजात शिशु का पालन – पोषण करके उसे हंसने-खेलने और दौड़ने के लायक बनाती है।

सारे सपने और पहचान मां से है :-
मां हमारे लिये इस सृष्टि पर एकमात्र साक्षात् भगवान होती है जो बिन मांगे ही सदैव हमें सब कुछ दे देती है, जो जीवन-पर्यंत स्नेह और आशीष रूपी वरदान देती है और सदा ही ममता, प्यार-दुलार बरसाती रहती है। संसार में हम प्रथम सहयोगी और गुरु के रूप अपनी मां को ही जानते है जो एक पालनकर्ता, अनुभवी अध्यापक, मार्गदर्शक और दोस्त जैसे अनगिनत किरदार हमारे जीवन में बखूबी निभांती है। इसलिए यह सदैव कहते हैं कि कभी भी किसी बच्चे से उसकी मां न बिछड़े। मां अपने बच्चे को हर हाल में खुश रखती है, संभालती है और दिलोजान से उसकी परवरिश करती है। अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में एक बच्चा अपनी मां के आंचल में जितनी बेफिक्री से अपनी जिंदगी जितने सुकून से जीता है, उतना बड़ा होने के पश्चात वह कभी नहीं जी पाता।

मां की ममता और मायने कभी नहीं बदलते:-
जब चारों तरफ़ घोर अंधेरा नजर आये,दिल दुनिया की झंझावातों से चीख़ उठे, जब कहीं से मदद की कोई भी उम्मीद न दिखाई दे, सारे के सारे रिश्ते जब बेमानी लगें और इस भरी-पूरी दुनिया में जब बिल्कुल अकेलापन महसूस होने लगे तो बस आत्मा की गहराइयों से सिर्फ़ एक ही स्वर निकलता है “मां”..
असल में,हमारी सारी परेशानियों,निराशाओं का एकमात्र निदान होती है मां, वह घोर निराशा में भी हमें धीरज और ढ़ाढ़स बंधाती है। हम चाहे जितने भी बड़े हो जाएं,चाहे जितनी भी ऊंचाई में पहुंच जाये,वक़्त के साथ भले ही हमारे लिए रिश्तों की प्राथमिकताएं बदल जाएं,लेकिन मां की ममता और मायने कभी नहीं बदलते।
जैसे – जैसे हमारी उम्र बढ़ने लगती है तो हम मां को भूलने लग जाते हैं लेकिन मां हमें कभी नहीं भूलती। भले ही हमें मां की फिक्र न हो लेकिन उसे अंतिम सांस तक हमारी फिक्र रहती है। हम बड़े होने पर हम मां के प्रति प्यार जताना आवश्यक नहीं समझते लेकिन मां हर वक़्त अपनी बाहें पसारे हमारे ऊपर प्यार लुटाने को तैयार रहती है।
इस आधुनिकता की चकाचौंध में अब हमें मां के कई रूप देखने को मिल रहे हैं-जैसे ‘अनवेड मदर’, ‘सिंगल मदर’, ‘वर्किंग मदर’, लेकिन इन सारे रूपों के पश्चात भी मां के मूल रूप में अभी तक कोई भी बदलाव नहीं आया है।

हमेशा दिल में रहती है मां:-
सोचिये, जीवन में मुख्य अहमियत रखने वाली “मां” भी कभी हमसे दूर हो सकती है क्या? कभी नहीं हो सकती,क्योंकि पहले तो वह अपना रुधिर,अस्थियों और अपनी धड़कन का अंश देकर वह अपनी संतान में स्वयं का नवसृजन करती है और फिर अपनी भावनाओं, व्यवहार, सीख को आगे हस्तांतरित करके स्वयं को जीवित रखती है। हमारे सम्पूर्ण जीवन, स्मृतियों और कार्यों में मां की इस कदर से पैठ होती है कि उसके स्थूल देह के नाश होने के बाद भी उसकी सूक्ष्म देह और आत्मा का जुड़ाव सदैव हमारे साथ ही बना रहता है। हम जितनी बार जब भी सांस लेते हैं, मां को अपने ही भीतर जीते रहते हैं। इस तरह मां अपनी संतान के साथ ताउम्र अटल रूप से रहती है।

सदैव हमें को तलाशते रहते है:-

अगर हमें हमसे भी ज्यादा कोई जानता और समझता है तो वह है सिर्फ हमारी मां होती है। हमारी सारी पसंद – नापसंद और जरूरतों को वह तब से जानती है, जब हम स्वयं को ही जानते – पहचानते नहीं थे,हमारा आंशिक अस्तित्व था और हम बोलना भी नहीं सीखे थे। ठीक अब बड़े होने पर भी वह हमारा अच्छा-बुरा, पसंद-नापसंद हमसे बेहतर समझती है और हमें बचपन की तरह ही बड़े प्यार से समझाती है।
स्कूल/कॉलेज जाने से लेकर ऑफिस जाने तक वह हमारे लंच बॉक्स में हमारें सारे पसंदीदा पकवान रखती है ताकि मनपूर्वक खाये और कभी भूखे न रह जाये। तभी तो लोग ताउम्र अपनी पत्नी के हाथों में अपनी मां के हाथों का स्वाद तलाशते रहते हैं। सिर्फ स्वाद ही नहीं, स्नेह, आत्मीयता, अपनत्व, ममत्व और परवाह का एहसास भी हमें मां से ही प्राप्त होता है और उसे हम जीवनभर अन्य रिश्तों में भी तलाशते रहते हैं कि कहीं उसका कुछ तो अंश तो मिल जाये, लेकिन यह सच है “मां” की बराबरी कोई भी कभी भी नहीं कर सकता, क्योंकि मां अनुपम,अद्वितीय और अतुलनीय होती है।

तो आप सभी अपनी देवी स्वरूपा,जन्मदात्री मां को याद करें, उन्हें सम्मान,प्यार और अपनापन दें और वरदान स्वरूप आशीष प्राप्त करें।
मां के आशीष में जो शक्ति और सामर्थ्य है, वह अद्भुत होता है। हमें यह शक्ति वो सब दे देती है जिसको प्राप्त करने की हम दिली आकांक्षा और कामना करते हैं।
मां इस धरा का सबसे नायाब तोहफा होती है!
असल! में इस धरती का असली भगवान सिर्फ़ “मां” होती है!

#शिवांकित तिवारी ‘शिवा’

परिचय–शिवांकित तिवारी का उपनाम ‘शिवा’ है। जन्म तारीख १ जनवरी १९९९ और जन्म स्थान-ग्राम-बिधुई खुर्द (जिला-सतना,म.प्र.)है। वर्तमान में जबलपुर (मध्यप्रदेश)में बसेरा है। मध्यप्रदेश के श्री तिवारी ने कक्षा १२वीं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की है,और जबलपुर से आयुर्वेद चिकित्सक की पढ़ाई जारी है। विद्यार्थी के रुप में कार्यरत होकर सामाजिक गतिविधि के निमित्त कुछ मित्रों के साथ संस्था शुरू की है,जो गरीब बच्चों की पढ़ाई,प्रबंधन,असहायों को रोजगार के अवसर,गरीब बहनों के विवाह में सहयोग, बुजुर्गों को आश्रय स्थान एवं रखरखाव की जिम्मेदारी आदि कार्य में सक्रिय हैं। आपकी लेखन विधा मूलतः काव्य तथा लेख है,जबकि ग़ज़ल लेखन पर प्रयासरत हैं। भाषा ज्ञान हिन्दी का है,और यही इनका सर्वस्व है। प्रकाशन के अंतर्गत किताब का कार्य जारी है। शौकिया लेखक होकर हिन्दी से प्यार निभाने वाले शिवा की रचनाओं को कई क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाओं तथा ऑनलाइन पत्रिकाओं में भी स्थान मिला है। इनको प्राप्त सम्मान में-‘हिन्दी का भक्त’ सर्वोच्च सम्मान एवं ‘हिन्दुस्तान महान है’ प्रथम सम्मान प्रमुख है। यह ब्लॉग पर भी लिखते हैं। इनकी विशेष उपलब्धि-भारत भूमि में पैदा होकर माँ हिन्दी का आश्रय पाना ही है। शिवांकित तिवारी की लेखनी का उद्देश्य-बस हिन्दी को वैश्विक स्तर पर सर्वश्रेष्ठता की श्रेणी में पहला स्थान दिलाना एवं माँ हिन्दी को ही आराध्यता के साथ व्यक्त कराना है। इनके लिए प्रेरणा पुंज-माँ हिन्दी,माँ शारदे,और बड़े भाई पं. अभिलाष तिवारी है। इनकी विशेषज्ञता-प्रेरणास्पद वक्ता,युवा कवि,सूत्रधार और हास्य अभिनय में है। बात की जाए रुचि की तो,कविता,लेख,पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ना, प्रेरणादायी व्याख्यान देना,कवि सम्मेलन में शामिल करना,और आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति पर ध्यान देना है।00

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।