जिंदगी क्या है

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फूल बन कर,
मुस्कराना जिन्दगी है l
मुस्करा के गम,
भूलाना जिन्दगी है l
मिलकर खुश होते है,
लोग तो क्या हुआ l
मिले बिना दोस्ती,
निभाना भी जिन्दगी है।।

जिंदा दिलो की,
आस होती है जिंदगी।
मुर्दा दिल क्या,
खाक जीते है जिंदगी।
मिलना बिछुड़ जाना,
तो लगा रहता है ।
जीते जी मिलते
रहना ही जिंदगी है।।

जब तक जीये
शान से जीये जिंदगी।
अपनी बातो पर,
अटल रहकर जीये ।
बोलकर मुकर जाने,
वाले बहुत मिलते है।
क्योंकि ऐसे लोगो का ही,
आजकल जमाना है।।

खुद की पहचान बनाकर,
जीने वाले कम मिलते है।
प्यार से जीने वाले भी,
कम मिलते है।
वर्तमान में जीने वाले,
जिन्दा दिल होते है।।

जिंदगी को जो,
प्यार से जीते है।
गम होते हुए भी,
खुशी से जीते है।
ऐसे ही लोगो की,
जीने की कला को।
लोग जिंदा दिली,
इसलिए कहते है।।

संजय ने लिख दी आज,
जिंदगी की हकीकत को।
क्योकिं लेखक लिखकर,
कुछ व्या कर सकता है।
खुदकी जिंदगी को पढ़ना,
खुद ही बड़ी कला है।।

जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन बीना (मुम्बई)
19/03/2020

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।