भुवनेश्वर यात्रा संस्मरण (भाग 6) इस्कॉन मंदिर

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ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर राज्य का सबसे बड़ा शहर है जिसे भारत के पूर्वी हिस्से का सांस्कृतिक केंद्र माना जाता है। ऐतिहासिक मंदिर और अपनी गौरवशाली विरासत के कारण इस शहर को टेम्पल सिटी के रूप में भी जाना जाता है। यह शहर हिंदू, जैन और बौद्ध संस्कृति में विविधता और एकता का प्रतीक है। इस राज्य में भुवनेश्वर, कोणार्क और पुरी साथ मिलकर एक ‘स्वर्ण त्रिभुज’ बनाते हैं।

भुवनेश्वर नगर के बीचोंबीच स्थित इस्कॉन मंदिर का आकर्षण पर्यटकों को बरबस अपनी ओर खींचता है। यह मंदिर विश्व भर में फैले इस्कॉन मंदिर का हिस्सा है। यहां कृष्ण, बलराम, जगन्नाथ, सुभद्रा और गौर निताई की प्रतिमा स्थापित है। हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालू यहां भजन और पूजा में शामिल होते हैं। कृष्ण उत्सव और जगन्नाथ उत्सव के दौरान इस मंदिर में भारी भीड़ जमा होती है। इस मौके पर भव्य शोभायात्रा भी निकाली जाती है।

मंदिर के बाहरी कक्ष में राधाकृष्ण की मनमोहक मूर्तियां, धार्मिक प्रतीक चिह्न और कृष्ण लीला से जुड़े साहित्य उपलब्ध हैं। मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अतिरिक्त कमल दल की आकृति का एक अन्य मंदिर भी स्थापित है जिसकी बनावट मन मोह लेती है।

संध्या भजन और आरती में हमें भी शामिल होने का मौका मिला…एक आचार्य मधुर स्वर में ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ की धुन गुनगुना रहे थे और कुछ अनुयायी उनके साथ संगत कर रहे थे। पट खुलने के पूर्व तक सभी भक्त भजन कीर्तन के साथ झूमते गाते रहे…पट खुलते ही पूरा कक्ष दूधिया प्रकाश से नहा उठा…
दर्शन के बाद प्रसादस्वरूप हमें कमल का एक पुष्प भी मिला जिसे हमने पूरी यात्रा में संजोकर रखा…

इस्कॉन मंदिर की चर्चा के बीच इस संस्था के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद के जीवन के बारे में जानना भी जरूरी है…

इस्कॉन यानी इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ कृष्णा कॉन्शियसनेस… यह संस्था गौड़ीय वैष्णव परंपरा से संबंधित है जो भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत की शिक्षा पर आधारित एक भक्ति परंपरा है।

1959 में संन्यास ग्रहण के बाद स्वामी प्रभुपाद ने वृंदावन में श्रीमद्भागवतपुराण का अनेक खंडों में अंग्रेजी में अनुवाद किया। आरंभिक तीन खंड प्रकाशित करने के बाद 1965 में अपने गुरु के अनुष्ठान को संपन्न करने वे 70 वर्ष की आयु में बिना धन और बिना किसी सहायता के अमेरिका जाने के लिए निकले जहाँ 1966 में उन्होंने इस्कॉन की स्थापना की। 1968 में प्रयोग के तौर पर वर्जीनिया, अमेरिका की पहाड़ियों में नव वृंदावन की स्थापना की। दो हजार एकड़ के इस समृद्ध कृषि क्षेत्र से प्रभावित होकर उनके शिष्यों ने अन्य जगहों पर भी ऐसे समुदायों की स्थापना की। 1972 में टेक्सास के डलास में गुरुकुल की स्थापना कर प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की वैदिक प्रणाली की शुरुआत की। आज विश्व भर में इस्कॉन के आठ सौ से ज्यादा केंद्र, मंदिर, गुरुकुल एवं अस्पताल आदि प्रभुपाद की दूरदर्शिता और अद्वितीय प्रबंधन क्षमता के जीते जागते साक्ष्य हैं।

इस्कॉन मंदिर हर दर्शनार्थी के अंदर भगवान कृष्ण को समझने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है…

क्रमशः

#डा. स्वयंभू शलभ

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।