भारतीय भाषाओं की साझा चुनौतियाँ व समाधान परिसंवाद

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भारतीय भाषाओं की चुनौतियां व समाधान परिसंवाद में उपस्थित सभी मित्रगणों को मेरा हार्दिक प्रणाम! इस परिसंवाद के प्रयत्न के लिए डॉ. मोतीलाल गुप्ता आदित्य जी, निदेशक, वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई और उनके सहयोगीयों का हार्दिक धन्यवाद!

आदरणीय, यह अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि स्वतंत्रता के ७२ वर्षों के बाद भी भारीतय भाषा-भाषियों को भारतीय भाषाओं के लिए गहन संघर्ष करना पड़ रहा है। इस संघर्ष के होते हुए भी भारतीय भाषाओं की स्थिति दिन-प्रतिदिन और भी बदतर होती जा रही है। किसी भी भाषा का जीवन इस बात पर निर्भर है कि उसका सभी मातृ-भाषा कार्य-क्षेत्रों में प्रयोग व वर्चस्व कितना है। आज के समय में सब से महत्वपूर्ण भाषा कार्यक्षेत्र शिक्षा का माध्यम है। हर बच्चा शिक्षा ग्रहण कर रहा है और बच्चे की शिक्षा के माध्यम की भाषा ही उसकी पहली भाषा बन जाती है। इस लिए भारतीय भाषाओं का विद्यालय स्तर पर भी शिक्षा के माध्यम के रूप में विस्थापन निश्चित रूप से भारीतय भाषाओं के संहार की ओर ले जा रहा है।

भारतीय भाषाओं के भाषा कार्य-क्षेत्रों से निष्कासन का कारण वो भ्रम हैं जो औपनिवशिक स्थिति और सभ्रांत वर्ग के अल्पदृष्टीय स्वार्थ ने भारतीय नीतिकारों और भारतीय जनमानस के दिमागों में बिठा दिए हैं। ये भ्रम कुछ इस तरह के हैं: १. अंग्रेजी ही ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और उच्चतर ज्ञान की भाषा है; २. अंग्रेजी ही अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान और कारोबार की भाषा है, ३. भारतीय भाषाओं में उच्चतर ज्ञान की भाषाऐं बनने का सामर्थय नहीं है, और; ४. अंग्रेजी सीखने का सही और पक्का तरीका इसका शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग है।

अंग्रेज़ी भाषा के महत्व को मैं कम करके पेश नहीं करना चाहता, इस लिए मैं उपरोक्त में अंतिम भ्रम की बात पहले करना चाहता हूँ।

यह बहुत हैरानी वाली पर सत्य बात है कि अंग्रेज़ी सीखने के लिए भी मातृ-भाषा माध्यम अंग्रेज़ी माध्यम से बेहतर है (यदि बाकी चीज़ें एक सी हों तो)। दुनिया भर में अंग्रेजी पढ़ाने वाली बर्तानिया सरकार की संस्था ब्रिटिश काउंसिल की पुस्तक से यह कथन इस बात पर शक की कोई गुंजाईश नहीं छोड़ता (इंग्लिश लैंगुएज एंड मीडियम आफ़ इंस्ट्रक्शन इन बेसिक एजुकेशन, २०१७, पन्ना ३): “चारों ओर यह समझ फैली हुई है कि अंग्रेजी भाषा पर मुहारत के लिए अंग्रेजी एक विषय के रूप में पढने से अंग्रेजी माध्यम में पढना बेहतर तरीका है| पर इस समझ के लिए कोई प्रमाण हासिल नहीं है|”

इस संदर्भ में यूनेस्को की २००८ में छपी पुस्तक (इम्प्रूवमेंट इन द कुआलटी आफ़ मदर टंग – बेस्ड लिटरेसी ऐंड लर्निंग, पन्ना १२) से यह टूक बहुत महत्वपूर्ण है: “हमारे रास्ते में बड़ी रुकावट भाषा एवं शिक्षा के बारे में कुछ अंधविश्वास हैं और लोगों की आँखें खोलने के लिए इन अंधविश्वासों का भंडा फोड़ना चाहिए। ऐसा ही एक अंधविश्वास यह है कि विदेशी भाषा सीखने का अच्छा तरीका इसका शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग है (दरअसल, अन्य भाषा को एक विषय के रूप में पढ़ना ज्यादा कारगर होता है)। दूसरा अंधविश्वास यह है कि विदेशी भाषा सीखना जितनी जल्दी शुरू किया जाए उतना बेहतर है (जल्दी शुरू करने से लहजा तो बेहतर हो सकता है पर लाभ की स्थिति में वह सीखने वाला होता है जो मातृ-भाषा में अच्छी मुहारत हासिल कर चुका हो)। तीसरा अंधविश्वास यह है कि मातृ-भाषा विदेशी भाषा सीखने के राह में रुकावट है (मातृ-भाषा में मजबूत नींव से विदेशी भाषा बेहतर सीखी जा सकती है)। स्पष्ट है कि ये अंधविश्वास हैं और सत्य नहीं। लेकिन फिर भी यह नीतिकारों की इस प्रश्न पर अगुवाई करते हैं कि प्रभुत्वशाली (हमारे संदर्भ में अंग्रेज़ी – ज.स.) भाषा कैसे सीखी जाए।”

अब मैं आप के सामने उपरोक्त पहले भ्रम से होने वाले भयावह नुकसानों को भी ब्रिटिश काउंसिल की उपरोक्त पुस्तक से टूक के रूप में ही रखना चाहता हूँ। ब्रिटिश काउंसिल का कहना है (पन्ना ३) कि “छ: से आठ साल लगते हैं कि कोई बच्चा इतनी-एक अंग्रेजी सीख ले कि उसे पाठ्य-क्रम में शामिल विषय-वस्तु की समझ आ सके| इतने साल लगा कर भी वह अंग्रेजी इतनी अच्छी तरह नहीं सीख सकता कि वह उच्च श्रेणियों के पाठ्यक्रम को अच्छी तरह समझ सके|”

आदरणीय, यदि उच्च श्रेणियों को छोड़ भी दें तो किसी बच्चे की शिक्षा के छह:-सात वर्ष के नुक्सान के शैक्षिक, आर्थिक, और भाषिक मायने क्या हैं आप अनुमान लगा सकते हैं। इसी लिए किसी भी अपरिचित भाषा को जब शिक्षा का माध्यम बनाते हैं तो वो ज्ञान की नहीं एक तरह से अज्ञानता की भाषा बन जाती है, और अंग्रेज़ी भाषा हमारे बच्चों के सन्दर्भ में अज्ञानता की भाषा के आगे कुछ नहीं है। समयाभाव के कारण मैं आंकड़ों में नहीं जाना चाहता पर शिक्षा के बारे में विश्व के विभिन्न देशों की सापेक्षिक स्थिति यही प्रमाणित करती है कि मातृ-भाषा में शिक्षा देने वाले देश ही शिक्षा में आगे हैं। विश्व भर की खोज और विश्व भर का सफ़ल व्यवहार भी यही साबित करता है।

आदरणीय, यह भी मिथ्या धारणा है कि यदि आप अधिक अंग्रेज़ी जानते हैं तो आप अंतर्राष्ट्रीय कारोबार में आगे होंगे। आदरणीय, अमेरिका का पिछले साल का चीन के साथ वार्षिक व्यापारिक घाटा तीन सौ लाख करोड़ रूपए का रहा है (यानि कि पंजाब के दो सौ साल के बजट से भी अधिक) और हमारा कोई पांच लाख करोड़ का। आप जानते हैं कि चीन अपनी भाषा में पढ़ाता है।

अंत में मैं इस भ्रम के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ कि भारतीय भाषाओं में उच्चतर ज्ञान की भाषाऐं बनने का सामर्थय नहीं है। आदरणीय, हर भाषा में यह सामर्थ्य है कि उसमें दुनिया के बड़े से बड़े ज्ञान की बात हो सके क्योंकि अंग्रेजी जैसी विकसित भाषा की आज की सारी शब्दावली भी उन मूल धातुओं से बनी है जो हजारों साल पहले भाषा में मौजूद थे| लगभग इन सभी धातुओं के समतुल्य हर भाषा में प्राप्त हैं| चिकित्सा विज्ञान से निम्न शब्द इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं: Haem – रक्त; Haemacyte – रक्त-कोशिका; Haemagogue – रक्त-प्रेरक; Haemal – रक्तीय; Haemalopia – रक्तीय-नेत्र; Haemngiectasis – रक्तवाहिनी-पासार; Haemangioma – रक्त-मस्सा; Haemarthrosis – रक्तजोड़-विकार; Haematemesis – रक्त-वामन; Haematin – लौहरकतीय; Haematinic – रक्तवर्धक; Haematinuria – रक्तमूत्र; Haematocele – रक्त-ग्रन्थि/सूजन; Haematocolpos – रक्त-मासधर्मरोध; Haematogenesis – रक्त-उत्पादन; Haematoid – रक्तरूप; Haematology – रक्त-विज्ञान; Haematolysis – रक्त-ह्रास; Haematoma – रक्त-ग्रन्थि।

उपरोक्त सभी तथ्यों की रोशनी में मैं भारतीय भाषाओं के लिए सब से बड़ी चुनौती उस अज्ञान को मानता हूँ जो भारतीय नीतिकारों और परिणामतय भारतीय जनमानस में व्याप्त है। भारतीय नीतिकारों की जानकारी की स्थिति कितनी दयनीय है इसका आंकलन इस बात से हो जाता है कि जानकारी की यह स्थिति इक्कीसवीं सदी के लगभग तीसरे दशक में है, उस समय में जिसे सूचना क्रांति का युग कहा जाता है। साथ की साथ उन वैधानिक, प्रशासनिक, और बाज़ारी आधारों को गिराना होगा जो अंग्रेज़ी भाषा को सत्ता की भाषा बनाते हैं और भारतीय भाषाओं को सत्ताविहीन किये हुए हैं। मेरी समझ में यह सब इस भ्रम-अवस्था को तोड़ कर ही हो सकेगा।

क्योंकि यह स्थिति सभी भारतीय भाषाओं की है (हिंदी समेत), इस लिए सभी मातृ-भाषा कर्मियों के प्रयत्नों को एक सूत्र में पिरोने की नितांत आवश्यकता है। (जो भाषाएं अनुसूचित नहीं हैं उन पर तो सबसे पहले ध्यान देने की आवश्यकता है)।

मुझे पूरी आशा है कि आज के परिसंवाद का यह प्रयत्न हमें अपने उद्देश्य की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा। मैं प्रायोजकों के लिए एक बार फिर अपना आभार प्रकट करता हूँ। उपस्थित न हो पाने के लिए एक बार फिर क्षमा याचना! ( वैश्विक हिंदी सम्मेलन )

जय भारत की भाषाएँ

डॉ. जोगा सिंह विर्क, प्रो.(सेनि) भाषा विज्ञान, पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।