चाय की ‘नाट’ कहीं मिले,तो बताना…’नाक’ काटना है..

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rohit

भियाओन नमस्ते,मैं क्या केरिया था कि…अभी वैसे ही अपन लोगों का दिमाग मोदी जी ने जबरन नोटबंदी करके खराब कर दिया,पर क्या करें,अपने को देशभक्ति का भूत भी चढ़ा है…और इधर नगर निगम वाली भाभी जी के साथ उनके अफसर लोगों ने मिलकर नगर को स्वच्छ करने की मगजमारी अलग चालू करवा दी…अब भिया,ये जो बैंक के लफड़े में अपने मगज की मारामारी होती है न,उससे गुस्सा तो भोत आती है…पर अपन तो साला गुस्सा थूक भी नी सकते रे…साला नगर को स्वच्छ और ‘हेमामालनी’ के सरीका ब्यूटी वाला फूल जो बनाना है..! वैसे भी भोत दिन हो गए,जब एक भिया ने बोला भी था कि,सड़कें जो हैं,वो हेमा मालनी के गाल की तरह चिकनी-चपाट कर देंगे…तो मैं सोच रिया था कि उन्हीं की तरह अपना नगर भी कभी ब्यूटीफुल हो जाए तो मजे आ जाए बावा..! फिर तो अपने भियाओन भी किसी धर्मेन्दर पाजी से कम नी लगेंगे…सई केरिया हूँ न भिया…ये सब तो ठीक है…खैर,बैंकों की लाइन कभी तो खतम होगी ही…लेकिन ऐसा अपन नगर को स्वच्छ और ब्यूटीवाला फूल बन जाने के बारे में कुछ नी के सकते रे…न तो अपन लोग सुधरने को तैयार और न इस स्वच्छता में लगे भियाओन के ‘रंग’ में घुली ‘भ्रष्टाचार की भंग’ का कभी कुछ हो सकता है… बाकी जमीनी हकीकत तो नगर को स्वच्छता का ‘तमगा’ मिलने या न मिलने का फैसला होने के बाद ही मालूम पड़ेगी…हाँ भिया… तो अब मैं मुद्दे की बात पे आ रिया हूं…कहीं चाय की ‘नाट’ मिले तो बताना…साला अब तो मैं उसकी ‘नाक’ ही `सुर्पणखा की तरह’ काट डालूंगा…हां यार,परेशान करके धर दिया..!चाय की नाट…चाय की नाट…हाँ नी तो…वो भिया हुआ यूं कि,अपन गए थे एक साथी के बड्डे सेलिब्रेशन में…अब वहां हुआ यूं कि,पेले तो केक कटवाया…वहां भी साला केक कटा वो तो ठीक,लेकिन ये जो खाने वाला केक आज-कल थोबड़े पर लगाने का नया-नया सीजन चालू हुआ है,वो अपने तो पल्ले ही नी पड़ता…चलो फिर भी सबकी खुशी में अपना खुश…(अब इसका मतलब मत पूछना!!)केक खाया,खिलाया और पोता-पुताई सब हो गई…बधाई-वदाई सब दे दी…फिर उसके बाद नम्बर आया नास्ते का…वो भी अपन ने लपक के किया…थोड़ी देर बैठा-बाठी के बाद बिदाई की बेला आ गई…अब अपन निकल ही रहे थे कि,एक भिया ने चाय की ‘चम्मच’ पकड़ा दी…अपन ठेरे बीजी आदमी…और सई बात ये है कि,मन भी नी था रे…अपन बोले-नी भिया…फिर कभी बाद में पियेंगे चाय-वाय…उसी समय बीच में जबरन एक भिया छोटे भीम की तरह कूद पड़े…बोले कि-नी भिया अब तो चाय पी के ही जाना पड़ेगी…चाय की नाट लग गई है…मैंने फिर भी मना किया…नी भिया अभी मन नी है…फिर क्या था,दो-चार भियाओन एक साथ बोलने लगे-नी भिया अब पी ही जाओ…चाय की नाट लग गई…अच्छी नी रेती…अब ये ‘नाट की बीमारी’ अपने शहर में ही ज्यादा पाई जाती है…उस वकत इतनी चिढ़ छूटी न वो साली ‘नाट’ पे,कि बस…अब तभी से अपन ने पिरण मतलब पक्की ठान ली,के ये ‘नाट’ जब भी कईं मिलेगी,उसकी ‘नाक’ ही काटना है…भियाओनों,तुमको भी कईं टकरा जाए तो बताना…उचित इनाम दूंगा…न रहेगी ‘नाट’ और न बचेगी उसकी ‘नाक’…बस भिया अब चलते हैं…भोत देर हो गई…फिर मिलेंगे चलते-फिरते…l

                                                                           #रोहित पचोरिया ‘इंदौरी’

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।