माँ की तस्वीर

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sukshama

वो चली गई ऐसे ही चुपचाप,

उसके जाने के बाद पता चला कि,

वो कितनी महान थीl
वो सुलाती थी  बड़े प्यार से,

खुद गीले में सोकर मुझे सूखे में..
वो खिलाती थी मुझे थाली भरकर,

अपने हाथों से मनव्वल करके..

मैं  खाकर खेलने लगता था,

यह जाने बगैर ही कि,

उसने कुछ खाया या नहीं?

सुबह नहला-धुलाकर,

साफ़ कपड़े पहनाकर वो मुझे..
स्कूल छोड़ने जाती थी गोद में उठाकर,

मुझे तो पता ही नहीं था
कि,वो नंगे पांव चलती थी..

ताप,धूप और कीचड़ में
मेरे बीमार होने पर,

वो निकालती थी,

कुछ मुड़े-तुड़े नोट..
जो उसने शायद,

अपनी साड़ी या पायल के लिए

जोड़े होंगेl
वो पैसे निकालकर डॉक्टर को दे आती,

अपने लाड़ले को हँसता-खेलता देखकर
वो खुश हो जाती थी,

अपनी फटी किनारी वाली साड़ी में हीl
जब उसका ध्यान जाता होगा,

अपने पायलविहीन पैरों की ओर,
तो मन-ही-मन कहती होगी,

मेरा बेटा ही तो मेरा गहना है..
कितने अच्छे से समझती होगी,

वो अपने-आपकोl
मुझे पिताजी की मार से

बचाने के लिए,

वो ढाल बन आ खड़ी होती थी..
मेरी गलतियों को अपने सर लेकर,

खुद डांट खाकर बिसूरती..

किसी कोने में जाकर,

और मैं खुश होकर सो जाता,

यह जाने बगैर ही कि,

वो मुझे इतना क्यों चाहती है?
ज़िन्दगी के झमेलों में,

वो न कभी बन पाई-न संवर पाई,

न कभी खुश हो पाई..
बस जीती रही दूसरों के लिए,

एक बहू,पत्नी और माँ बनकर
और मैं नादान न तो कभी उसे,

समझ पाया,न ही उसके मरने पर,

जी भर के रो पाया..
लेकिन आज जब मैं बड़ा हो गया हूँ,

उसके आशीष से रहता हूँ बड़े घर मेंl

पहनता हूँ बढ़िया कपड़े,

घूमता हूँ महंगी गाडियों में,

लेकिन समझ नहीं आता..

उसके लिए क्या करूँl
बस………….मैंने उसकी

एक छोटी-सी तस्वीर लगा रखी है,

अपने बड़े-से घर में,

                                                                           #सुषमा दुबे

परिचय : साहित्यकार ,संपादक और समाजसेवी के तौर पर सुषमा दुबे नाम अपरिचित नहीं है। 1970 में जन्म के बाद आपने बैचलर ऑफ साइंस,बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और डिप्लोमा इन एक्यूप्रेशर किया है। आपकी संप्रति आल इण्डिया रेडियो, इंदौर में आकस्मिक उद्घोषक,कई मासिक और त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन रही है। यदि उपलब्धियां देखें तो,राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में 600 से अधिक आलेखों, कहानियों,लघुकथाओं,कविताओं, व्यंग्य रचनाओं एवं सम-सामयिक विषयों पर रचनाओं का प्रकाशन है। राज्य संसाधन केन्द्र(इंदौर) से नवसाक्षरों के लिए बतौर लेखक 15 से ज्यादा पुस्तकों का प्रकाशन, राज्य संसाधन केन्द्र में बतौर संपादक/ सह-संपादक 35 से अधिक पुस्तकों का लेखन किया है। पुनर्लेखन एवं सम्पादन में आपको काफी अनुभव है। इंदौर में बतौर फीचर एडिटर महिला,स्वास्थ्य,सामाजिक विषयों, बाल पत्रिकाओं,सम-सामयिक विषयों,फिल्म साहित्य पर लेखन एवं सम्पादन से जुड़ी हैं। कई लेखन कार्यशालाओं में शिरकत और माध्यमिक विद्यालय में बतौर प्राचार्य 12 वर्षों का अनुभव है। आपको गहमर वेलफेयर सोसायटी (गाजीपुर) द्वारा वूमन ऑफ द इयर सम्मान एवं सोना देवी गौरव सम्मान आदि भी मिला है।

 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।