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भुला सको तो भुला ही देना
उन बेबुनियादी बातों को।
मिटा सको तो मिटा ही देना
उन आध-अधूरी यादों को।
गर समझ सको मेरे इस मन को
तो मन में बसाकर रखे रहो।
नही हौसला हो रखने का
तो दूर नही अति दूर रहो।।
मिट्टी का तेरा तन भी है
मिट्टी का ही मेरा तन।
जब सब कुछ एक सरीखा अपना
तो किस पर मान करे अब हम।
जीवन चंद्र लम्हों का अपना
फिर पता नही क्या होगा रंग।
लोग कहेंगे क्या अब हमसे
 यह भाव छोड़ रहे सब संग।
नही विस्मरण करें उन्हें हम
जिनसे जीवन फला-बड़ा।
हो तूफानी ही रातें  क्यों न
आ देखें आंगे कौन खड़ा।
यह जीवन एक परीक्षा ही है
जो हर पल एक संघर्ष है।
आज नही जीते तो कल है
यही आश नव विहर्ष है।।
चलो रुकों न खूब बड़ो बस
नही किसी से कुछ लेना है।
जो भी प्राप्त हुआ है हमको
बस वही बाँट खुश रहना है।
उत्कर्षमयी होवे मम जीवन
मृत्यु से भी डरे नही।
रहे अडिग हम हर हालत में
हम रहें न रहें पर मिटें नही।
*शास्त्री दीपक जैन “ध्रुव”*
           *(तिगोड़ा)*
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