एक चीख निकली थी

khushabu kumari
मासूम सी कली थी,
थोड़ी सी ही खिली थी,
की अचानक एक हाथ बढ़ा,
जो उसे कुचलने निकला,
तब एक चीख निकली थी,
पर किसी ने न सुनी थी।
फिर वो थोड़ी और खिली,
थोड़ी और हुई बड़ी,
जमाने मे जब रखा कदम,
उसकी महक से खिला संसार हरदम,
पर, एक नज़र, जो पड़ी उस पर,
फिर एक हाथ, जो बढ़ा उस ओर,
फिर वो सहमी थी,
हाँ, फिर वो सहमी थी,
फिर वो चीख़ निकली थी,
पर किसी ने सुना नही,
फिर वो अकेली लड़ी थी।
लड़कपन के उम्र, जब हुए ख़त्म,
फिर वो सब भुल उठी, आगे बढ़ी,
पर फिर पनपी वही कहानी,
हर राह में, वो एक निशानी,
हर नज़र उसे चिर दे,
हर जुबान उसे, खीचं दे।
और आया एक वो भी दिन,
जब तोड़ दी गयी वो, अपनी डाली से,
बिखेर के रख दी गयी, हाथों की धिक्कारि से,
अब हर कली, बस पूछे एक सवाल,
क्या यही है, हमारी ज़िंदगी का हाल?
क्यों हर नज़र, हमे मसल देती है,
क्यो खिलु मैं उस डाली में,
जहाँ हर हाथ, हमे कुचल देती है,
एक चीख हर वक़्त निकलती है,
वो चीख हर वक़्त निकलती है,
पर न होती कोई आवाज़,
न होता कोई आगाज़,
बस चीख निकलती है,
हर वक़्त निकलती है।
#खुशबू कुमारी

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