हाइकु, तांका और चोका : सरलीकृत शिल्प-विधान

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वैश्वीकरण के इस दौर में सांस्कृतिक अन्तःक्रिया और समंजन की प्रकिया में एक त्वरा परिलक्षित हो रही है। संस्कृति के महत्तम-अवयव के रूप में साहित्य भी इससे असंपृक्त नहीं है। इस संदर्भ में दृष्टव्य है कि भारतीय-भाषाओँ में जहाँ पहले सिर्फ अंग्रेजी-काव्य का व्यापक प्रभाव था, वहीं आज जापानी-काव्य-विधाओं ने भी अपनी महती-पैठ बना ली है।

इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि अध्यात्म, प्रेम आदि आंतरिक अनुभूतियों को संक्षिप्तता एवं सघनता से अभिव्यक्त कर पाने की जापानी कोशिश को पिछले कुछ दशकों में भारतीय काव्यजगत् ने औदात्य के साथ अंगीभूत किया है। अस्तु, जिन तीन पद्यात्मक विधानों ने यहाँ पैठ बनाई है, वे हैं- हाइकु, तांका और चोका ।

ये तीनों ही शिल्प-विधान की दृष्टि से सुस्पष्ट नियमों के अनुपालन की अभीप्सा विनिर्दिष्ट करते हैं। तीनों ही वर्णिक प्रकृति के होते हैं अर्थात् इनमें मात्राओं को नहीं गिना जाता और ये वर्ण प्रधान होते हैं। तीनों ही नित्य-विषमवर्णी (हर पद में विषम वर्ण) और नित्य-विषमपदी (पदों की संख्या भी विषम) होते हैं।

हाइकु-
3 पंक्ति और 17 वर्णों में बिंब-सामीप्य (juxtaposition of the images) से गुम्फित-भावों को दिखा देने वाली जापानी लघु कविता को हाइकु कहते हैं। ऐतिहासिक रूप से देखें तो हाइकु के अप्रतिम हस्ताक्षर मात्सुओ बाशो के काल (17 वीं शताब्दी) में यह विधा जीवन-दर्शन से जुड़ गई और जापानी कविता की युगधारा के रूप में स्थापित हो गई। कालांतर में यह विधा जापानी-साहित्य की सीमाओं का अतिक्रमण करती हुई विश्व साहित्य की निधि-सदृश हो चुकी है।

वैसे, आज जिस मात्रा में हाइकु लिखी जा रही है, वह उस गुणवत्ता का वाचक तो नहीं ही है, जो हाइकु से अपेक्षित है। उद्दाम-अनुभूति की कोमलकांत अभिव्यंजना इसका सर्वप्रमुख गुण है।

हाइकु का शिल्प विधान –
1.तीन पद
2.वर्ण-5-7-5, कुल वर्ण-17
3.अर्द्धवर्ण (संयुक्ताक्षर/स्वर रहित) नहीं गिना जाता, उदाहरण के लिए- प्यार, उक्ति आदि में दो ही वर्ण गिने जाएँगे।
4.तीन अलग-अलग वक्य हों।
5.भाव-सघनता सर्वप्रमुख तत्त्व

एक उदाहरण देखें –
# वेलेंटाईन डे/ हाइकु / कमलेश कमल

दिन खामोश (5)
रात भर रो लिया (7)
वेलेंटाईन ! (5)

अब अगर उपर्युक्त में पदों की संख्या 5 हो जाए, तो इसे तांका कहेंगे लेकिन सुसंबद्धता हो। इसमें कुल वर्ण-31 होते हैं। जो आज तांका है, वह पहले वाका कहा जाता था। (‘वा’ अर्थात् जापानी और “का” अर्थात् गीत।)

इससे स्पष्ट है कि जिसे हम लघुगीत कहते हैं, वह जापानी में तांका है, जिसका अपना शिल्प-विधान है। आरम्भ में ऐसा होता था कि एक कवि हाइकू (5-7-5)लिखता था, दूसरा उससे संबध्द 7,7 वर्ण की दो पंक्ति लिखता था और तांका बनाता था। इस तरह इसमें कौशल के साथ सहभागिता का तत्त्व भी सन्निहित था।
दो उदाहरण देखें:

1.व्यर्थ की दौड़/ तांका/ कमलेश कमल

प्रेम की तृष्णा (5)
दौड़ रही बेसुध (7)
जीवन भर (5)
हासिल कुछ नहीं (7)
इस वर्तुल पर (7)

2.छाँव की तलाश/ तांका/ कमलेश कमल

कड़ी धूप में (5)
व्यर्थता बोध भर (7)
भागा जा रहा (5)
ढेरों परिछाईयाँ (7)
छाँव को ढूंढ रहा। (7)

ध्यातव्य है कि अगर पदों की संख्या बढ़ जाए, तो यह चोका (लंबी कविता) बन जाती है, जिसके नियम निम्नवत हैं-
1. इसे वर्णों की गिनती के आधार पर लिखते हैं।
2.पंक्तियाँ इसमें भी 5 और 7 वर्णों के क्रम में ही व्यवस्थित होती हैं, यथा 5-7-5-7-5-7-7 आदि।
3. इसमें लम्बाई की कोई सीमा सुनिश्चित नहीं है।
4. अंत में 7 वर्ण का एक पद ज्यादा होता है, जैसे-5+7+5+7+7तांका । दूसरे शब्दों में हम कहें, तो अंत में 7 वर्णों का एक पद जोड़ना होता है।
5. पदों की संख्या सदैव विषम ।
6. जापान में ये कविता उच्च स्वर में गाई जाती रही है।
7. प्रत्येक पंक्ति स्वतंत्र – कोई पंक्ति अर्थ के लिए दूसरी पंक्ति पर निर्भर नहीं होगी, फिर भी सुसंबद्धता रहेगी ।

चोका का एक उदाहरण देखें:-
#तुम थे दूर/ चोका / कमलेश कमल

तुम थे दूर
रात भर बारिश
छूटती डोर
मन हुआ विह्वल
क्या जानो तुम
टप-टप-टपकीं
अँखिया खुली-खुली।

ध्यातव्य है कि इन तीनों में बिम्बों में अपनी बात कह देना सर्वोपरि है। साथ ही, इसकी चर्चा भी समीचीन है कि इन विधानों में नियमों का अनुपालन अनिवार्य है। अगर नियम न सधें, या भाव की सुंदरता बिगड़ रही हो, तो क्षणिका शीर्षक देकर लिखें। भाव-सौंदर्य से समझौता कर हाइकु, तांका या चोका लिखना कोई समझदारी भरा निर्णय नहीं।

आपका ही,
कमल

#कमलेश कमल
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।