वाह ताज

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swayambhu

इस बार की ग्वालियर की यात्रा के दौरान एक पूरा दिन ‘ताज’ के नाम रहा…28 नवंबर की सुबह करीब ढाई घण्टे के सफर के बाद हम ‘उत्कल एक्सप्रेस’ से ग्वालियर से आगरा पहुंचे…
इसके पूर्व करीब तीन दशक पहले यहां आया था…तब के ‘ताज’ और अब के ‘ताज’ की रौनक और खूबसूरती में कोई फर्क नहीं दिखा…इसके बारे में जानने समझने की जिज्ञासा तब भी उतनी ही थी जितनी आज है…हाँ पर्यटकों की संख्या और सुरक्षा के इंतजामों में भारी फर्क नजर आया। रविवार होने के कारण चहलपहल ज्यादा थी लेकिन सब कुछ व्यवस्थित और नियंत्रित था। काउंटर से टिकट लेने और कतारबद्ध होकर ताजमहल के मुख्य द्वार से अंदर आने में कहीं कोई परेशानी नहीं हुई…
अंदर बड़ी तादात में विदेशी पर्यटक नजर आये।अलग अलग देश से समूह में आये लोगों को भारतीय भेषभूषा में देखना एक दिलचस्प अनुभव था। कुछ विदेशी नौजवान शेरवानी कुरता और पगड़ी में नजर आये तो कुछ विदेशी महिलाएं साड़ी और परंपरागत राजस्थानी लिबास में भी नजर आईं। भारतीय परंपरा और संस्कृति के प्रति उनके सम्मान को देखकर एक सुखद अनुभूति हुई।
संगमरमर के इस अजीम शाहकार के बारे में क्या कहना…जिसने भी देखा…जब भी देखा…जुबां पर यही लफ़्ज आये… वाह ताज!
यहां आकर हर कोई एक रूहानी अहसास से सराबोर हो जाता है… इसकी ख़ूबसूरती का मुरीद बन जाता है…
मुहब्बत, दीवानगी और रूहानियत के कितने ही किस्से…कितने ही राज दफ़्न हैं इन खामोश दीवारों में…
इन खूबसूरत अहसासों से गुजरते हुए मैंने ताज के  इतिहास को टटोलने की भी कोशिश की…
ताज का जो हिस्सा पीछे की तरफ यमुना नदी से लगा हुआ है… वहां चहारदीवारी में निचले तल पर  दो दरवाजे हैं जो बंद हैं। इनमें से एक दरवाजा मेहमानखाने के ठीक नीचे और दूसरा मस्जिद के नीचे है।
माना जाता है कि ये दरवाजे मस्जिद से या मेहमानखाने से सीधे यमुना नदी तक पहुंचने के लिए हैं… शायद शाहजहां इन दरवाजों का प्रयोग माहताब बाग की ओर जाने के लिए करते रहे हों। माहताब बाग से ताजमहल का नजारा बेहद खूबसूरत नजर आता है…
जानकारों का मानना है कि शाहजहां के शासनकाल में किले से ताजमहल तक यमुना नदी से होकर कोई रास्ता गुजरता था। इन दरवाजों का उपयोग बसई घाट और दशहरा घाट से ताजमहल में प्रवेश करने के लिए किया जाता रहा हो शायद…कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि ताजमहल तीन मंजिला है। शाहजहां और मुमताज महल की असली कब्रों के बारे में भी स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती।
ताजमहल के अंदर भी कब्रों वाले तहखाने में सीढ़ियों से उतरते हुए बीच में दोनों ओर दरवाजे मिलते हैं। ये दरवाजे भी बंद हैं अभी। ताज के पहले तल पर मेहमानखाने और मस्जिद की ओर फर्श पर नीचे जाने के लिए सीढियाँ बनी हुई हैं… ये सीढियाँ भी आगे बंद हैं। कहते हैं इनमें से एक रास्ता उस सुरंग में खुलता है, जो आगरा किले तक जाता है।

इस पहेली को जितना सुलझाने की कोशिश करो और उलझती जाती है… इस विश्व धरोहर के विषय में कई सवालों का जवाब मिलना अभी बाकी है… यह जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग की बनती है। साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर इस महान कलाकृति के समग्र इतिहास को देश के सामने लाया जाना चाहिए…

फिलहाल इन सवालों को यहीं छोड़ता हूँ…
अंदर से निकलकर बाहर खुले में आते आते दिन ढलने लगा था… इत्तफाक से बाहर मीनार के पास कुछ हमख़याल मिल गए तो ‘कोई एक आशियाँ’ की बात भी चल निकली और माहौल खुशनुमा हो गया…
वापसी के दौरान आगरे का मशहूर ‘पेठा’ लेना नहीं भूले हम…
शाम 7 बजे ‘गोंडवाना एक्सप्रेस’ हमें आगरा से ग्वालियर ले आई…
यह सफर कुछ नई जानकारियों और कुछ नई जिज्ञासाओं के साथ पूरा हुआ जो आने वाले दिनों में न जाने कितनी रचनाओं को जन्म देगा…

#डॉ. स्वयंभू शलभ

परिचय : डॉ. स्वयंभू शलभ का निवास बिहार राज्य के रक्सौल शहर में हैl आपकी जन्मतिथि-२ नवम्बर १९६३ तथा जन्म स्थान-रक्सौल (बिहार)है l शिक्षा एमएससी(फिजिक्स) तथा पीएच-डी. है l कार्यक्षेत्र-प्राध्यापक (भौतिक विज्ञान) हैं l शहर-रक्सौल राज्य-बिहार है l सामाजिक क्षेत्र में भारत नेपाल के इस सीमा क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए कई मुद्दे सरकार के सामने रखे,जिन पर प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री कार्यालय सहित विभिन्न मंत्रालयों ने संज्ञान लिया,संबंधित विभागों ने आवश्यक कदम उठाए हैं। आपकी विधा-कविता,गीत,ग़ज़ल,कहानी,लेख और संस्मरण है। ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं l ‘प्राणों के साज पर’, ‘अंतर्बोध’, ‘श्रृंखला के खंड’ (कविता संग्रह) एवं ‘अनुभूति दंश’ (गजल संग्रह) प्रकाशित तथा ‘डॉ.हरिवंशराय बच्चन के 38 पत्र डॉ. शलभ के नाम’ (पत्र संग्रह) एवं ‘कोई एक आशियां’ (कहानी संग्रह) प्रकाशनाधीन हैं l कुछ पत्रिकाओं का संपादन भी किया है l भूटान में अखिल भारतीय ब्याहुत महासभा के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विज्ञान और साहित्य की उपलब्धियों के लिए सम्मानित किए गए हैं। वार्षिक पत्रिका के प्रधान संपादक के रूप में उत्कृष्ट सेवा कार्य के लिए दिसम्बर में जगतगुरु वामाचार्य‘पीठाधीश पुरस्कार’ और सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अखिल भारतीय वियाहुत कलवार महासभा द्वारा भी सम्मानित किए गए हैं तो नेपाल में दीर्घ सेवा पदक से भी सम्मानित हुए हैं l साहित्य के प्रभाव से सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-जीवन का अध्ययन है। यह जिंदगी के दर्द,कड़वाहट और विषमताओं को समझने के साथ प्रेम,सौंदर्य और संवेदना है वहां तक पहुंचने का एक जरिया है।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।