कान्हा

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aditi rusiya

मेरो छोटो सो *कान्हा*
देखो कैसे मुसकाय रहो री
चुप चुप माखन खाय के
देखो कैसे मुँह छपाय रहो री

जैसेही देखो मात यशोदा को
इत उत लुक़त फिर रहो री
नन्द बाबा के डर से देखो कान्हा
घर में न आय रहो री

गोप ग्वाल संग नदिया तीरे बैठ के गोपियंन के वस्त्र चुराय रहो री
लाज़ न आई कान्हा को तनिक भी
सारी गोपियाँ देखो लजाय रहीं री

जब जब राधा घर से निकरे
पीछे पीछे कान्हा हो लियो री
मुरली की मधुर तान छेड़ के कान्हा
सबको मन देखो मोह रयो री

सास नंद सबरी गारी देत हैं
छोटों सो कान्हा कैसे भरमाय है री
मोटी मोटी अखियों में कजरा लगा के
सबके मन को मोहे ले जात री

यशोदा को नंदलाला बड़ों नटखट है
कोई गोप ग्वाल न इसे बचत री
कबहुँ तान छेड़े मुरली की
तो कबहुँ माखन चुराय ले जात री

अदिति रूसिया 
वारासिवनी

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।