मद्यपान का करो त्याग

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asha jakad
सुनो सुनो रे भाई
मद्यपान अंधियारा लाई

जिस शरीर में यह पहुंच जाए,
नाड़ी मंडल झंकृत हो जाए ।
नस नस खिंचाव बढ़ जाए,
निष्क्रिय चेतना शून्य हो जाए ।

जीवन ऐसा अभ्यस्त हो जाए ,
बिन इसके तन सुध न पाए।
नशे में ही सारे सुख पाए ,
सारी चिंता, दुख भूल जाए ।

बना दे दिवालिया इसकी संगति,
चरित्र पतन, अपराधी प्रवृत्ति ।
तन-मन – धन की होवे क्षति
दुर्बल बुद्धि, जड़ ,अर्ध विक्षप्ति।

दुखी हो जाता सुखी परिवार,
मान सम्मान का होता ह्रास ।
मद्यपान का कर दो  त्याग ,
जीवन गए  हर्ष का राग ।।

जीवन में खुशियाँ आयेंगी,
परिवार में आनन्द लायेंगी।
सुख- शान्ति सरिता बहेगी,
मान – प्रतिष्ठा खूब मिलेगी ।

#आशा जाकड़ 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

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