बरसा और देश 

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divik
हारे में आग बुझी नहीं है ।
ढंडी चिलम ऒर
बासी हुक्के की नाल थामे
बरसा की चर्चा में खपता
आज भी वह
पुरखों से कहाँ कम है ।
बूढ़े बाप के चेहरे पर
जेवड़ी बाँटती हुई झुर्रियाँ
बेटे को
देस के मामलों पर
विचार नहीं करने देतीं।
फिलहाल
पहाड़-सी बरसा में
कोई रागिनी ही हाथ लग जाती
तो चुस्त हो लेता
बरसा थम जाती
तो खेत बो लेता।
हारे में आग बुझी नहीं है ।
उठकर हुक्का ही ताज़ा कर ले
चिलम भर ले।
साथी
बेवक्त उठ जाए
तो कहानी बढ़ाए नहीं बढ़ती।
कीकर-सी जिनदगी भी
हर घड़ी
सौ एहसान धरती है ।
अभी तो हॆं गोस्स॥
हारे में आग बुझी नहीं है ।
शायद अंगाकड़ा भी भुन चला होगा।
परसाल
कम से कम चिंता तो नहीं थी-
औरत थी
सँभाल रखती थी।
अंगाकड़ा भी
परोस देती थी वक्त पर।
शायद तीन दिन ऒर न थमेगी बरसा।
कौन जाने
थमेगी भी कि नहीं कभी।
दुखियारा आदमी भी एक हद पर चुप हो लेता है
आँखों में सब्र बोकर
आगे की सुध लेता है ।
कहने को तो यहाँ भी
हवा ही बहती है  देसी
पर कभी-कभार
दूर-दराज की हवा
कैसी धौंस जमा जाती है !
हारे में आग बुझी नहीं है ।
हारा भर जगह
टपके से बची रहे
तो इत्मीनान से कट जाएगा वक्त
जाने क्या वक्त हो गया होगा!

#डॉ. दिविक रमेश

परिचय: डॉ. दिविक रमेश सुप्रतिष्ठित वरिष्ठ कवि,बाल-साहित्यकार,अनुवादक एवं चिन्तक के रूप में जाने जाते हैंl २०वीं शताब्दी के आठवें दशक में अपने पहले ही कविता-संग्रह ‘रास्ते के बीच’ से चर्चित हो जाने वाले आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि हैं। ३८ वर्ष की आयु में ही ‘रास्ते के बीच’ और ‘खुली आंखों में आकाश’ जैसी अपनी मौलिक साहित्यिक कृतियों पर सोवियत लैंड नेहरू जैसा अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले इस पहले कवि ने १७-१८ वर्षों तक दूरदर्शन के विविध कार्यक्रमों का संचालन किया है। भारत सरकार की ओर से दक्षिण कोरिया में अतिथि आचार्य के रूप में आपने साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं। दिविक रमेश का जन्म १९४६ में दिल्ली के गांव किराड़ी में हुआ और १९८६ से उत्तर प्रदेश के दिल्ली से सटे प्रमुख शहर नोएडा में स्थाई रूप से रह रहे हैं। इनका वास्तविक नाम रमेशचंद शर्मा हैl आपकी अनेक कविताओं पर कलाकारों ने चित्र और कोलाज़ आदि बनाए हैं,जिनकी प्रदर्शनियां भी हुई हैं। इनकी बाल-कविताओं को संगीतबद्ध किया गया है। जहां इनका काव्य-नाटक ‘खण्ड-खण्ड अग्नि’ बंगलौर विश्वविद्यालय की एम.ए. कक्षा के पाठ्यक्रम में निर्धारित है,तो इनकी बाल-रचनाएं पंजाब, उत्तर प्रदेश,बिहार और महाराष्ट्र बोर्ड, कर्नाटक, केरल तथा दिल्ली सहित विभिन्न स्कूलों की विभिन्न कक्षाओं में पढ़ाई जा रही हैं। इनकी कविताओं-साहित्य पर पी-एच.डी. उपाधि के लिए शोध भी हो चुके हैं। आपके साहित्य पर शोधपरक-आलोचनात्मक कार्य होने के साथ ही समकालीन हिन्दी काव्य प्रवृत्तियों के परिप्रेक्ष्य में रचनाओं का अध्ययन भी किया गया हैl इनकी कविताओं को देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित संग्रहों में स्थान मिला है। इनमें से कुछ अत्यंत उल्लेखनीय हैं-इंडिया पोयट्री टुडे (आई.सी.सी.आर.), न्यू लैटर (यू.एस.ए.) स्प्रिंग-समर और इंडियन लिटरेचर आदि हैंl आप अनेक देशों-जापान, कोरिया, बैंकाक, हांगकांग, सिंगापोर, इंग्लैंड, सहित स्पेन आदि की यात्राएं कर चुके हैं। २०११ में दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरू महाविद्यालय के प्राचार्य पद से सेवामुक्त हुएl दिल्ली विश्वविद्यालय में १९७० से कार्यरत थे। वर्तमान में आप सदस्य-परीक्षा तुल्यता समिति, महात्मा गांधी हिन्दी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय(वर्धा) हैं। आपको प्रमुख पुरस्कार-सम्मान के रूप में दिल्ली हिन्दी अकादमी का साहित्यिक कृति पुरस्कार १९८३ में,सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार १९८४ में,गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार १९९७,एनसीईआरटी का राष्ट्रीय बाल-साहित्य पुरस्कार(१९८८) सहित श्री गोपीराम गोयल सृजन कुंज पुरस्कार-२०१६(श्रीगंगानगर) के अलावा भी कई सम्मान प्राप्त हुए हैंl आपकी प्रकाशित कृतियों में कविताः‘रास्ते के बीच( १९७७ और २००३), ‘हल्दी-चावल और अन्य कविताएं’, ‘छोटा-सा हस्तक्षेप’,‘फूल तब भी खिला होता’,‘गेहूँ घर आया है`,वह भी आदमी तो होता है,बाँचो लिखी इबारत(२०१२),माँ गाँव में है,वहाँ पानी नहीं है,`से दल अइ ग्योल होन`(कोरियाई भाषा में अनुदित कविताएं) सहित ‘अष्टावक्र’(मराठी में अनुदित कविताएं) आदि हैंl आलोचना साहित्य में आपके नाम ‘कविता के बीच से’,‘नए कवियों के काव्य-शिल्प सिद्धांत’,‘साक्षात् त्रिलोचन’,‘संवाद भी विवाद भी’,समझा-परखा, और हिन्दी का बाल-साहित्य:कुछ पड़ाव(भारत सरकार)है। ऐसे ही आपके बाल साहित्य में कविता संग्रह:जोकर मुझे बना दो जी,हंसे जानवर हो हो हो,कबूतरों की रेल,छतरी से गपशप,अगर खेलता हाथी होली,तस्वीर और मुन्ना,एवं मधुर गीत भाग-३ और भाग-४ भी है। कहानी संग्रह की बात करें तो `धूर्त साधु और किसान`,सबसे बड़ा दानी,शेर की पीठ पर,बादलों के दरवाजे,घमंड की हार,ओह पापा के अलावा बोलती डिबिया तथा स्टोरीज फॉर चिल्ड्रन आदि हैं। आपने लोक कथाएं: सच्चा दोस्त,पेड़ गूंगे हो गए और जादुई बांसुरी आदि रची हैं तो,आत्मीय संस्मरण:फूल भी और फल भी (लेखकों से संबद्ध) लू लू की सनक (कहानी संग्रह),बचपन की शरारत (सम्पूर्ण बाल-गद्य रचनाएं-२०१६),मेरे मन की बाल कहानियाँ आदि के अतिरिक्त बाल नाटक:‘बल्लू हाथी का बाल घर’,मुसीबत की हार आदि भी लिखी हैंl ‘खंड-खंड अग्नि’ की मराठी, गुजराती, कन्नड़ और अंग्रेजी अनुवाद सहित अनेक भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में रचनाएं अनुदित हो चुकी हैं। आपकी चुनी हुई बाल कविताओं का संग्रह : मैं हूं दोस्त तुम्हारी कविता का जल्दी ही प्रकाशन हो रहा हैl

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।