लोकतंत्र में उग रहे, नेता खरपतवार। राज काज से खेंचते,ज्यों फसलों का सार। ज्यों फसलों का सार ,चाटते दीमक जैसे। कर समाज में फूट, सेंकते रोटी वैसे। कहे लाल कविराय, सब भ्रष्ट किया है तंत्र। चरत रोजड़े खेत, चरे नित ये लोकतंत्र। . आजादी के दौर से, नेता नहीं महान। […]
