मनोविज्ञान

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rupesh kumar
मनोविज्ञान का अर्थ होता है मन का विज्ञान ! इसके अंतर्गत मानव मन को समझने और उसके अनुसार कार्य करने की सलाह दी जाती हैं ! बच्चों के मनोविज्ञान का अध्ययन बाल मनोविज्ञान के अंतर्गत किया जाता है सभी चाहते हैं कि उनके बच्चों का भविष्य उज्जवल हो !
इस बारे में मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब बच्चों का मन खेलने का हो तो उनको पढ़ने के लिए मजबूर करना ठीक नहीं बल्कि इससे ज्यादा बच्चों के मनोविज्ञान को समझना जरूरी हैं !  बच्चों को पढ़ाने के लिए जब भी कहे तो उन पर गुप्त रूप से नजर अवश्य रखें कि वह पढ़ रहे हैं या यूं ही समय व्यतीत कर रहे हैं ! बच्चों पर दबाव डालने के बजाय यह ध्यान रखें कि जब उनका मन खेल की तरफ है तो उसे खेलने दो जब वे खेल ले तो फिर पढ़ने के लिए कहें इस मामले में बच्चों के साथ ही नहीं बड़ों के साथ भी ऐसा ही हैं बड़े भी मूंड नहीं होने पर काम नहीं करते हैं और किसी दबाव में आकर काम भी करते हैं तो मन नहीं लगता है काम अधूरा रह जाता है या उनमें गलतियां रह जाती हैं ! जब बड़ो के साथ ऐसा होता है तो बच्चों के साथ ऐसी जोर-जबर्दस्ती क्यों ?

बच्चों को पढ़ने के लिए तब कहे जब पढ़ने के लिए पूरी तरह से तैयार हो मूंड होने पर भी कम समय में बेहतर ढंग से पढ़ाई कर लेते हैं जबकि मूंड ना होने पर भी दिन भर में भी एक अक्षर तक भी नहीं पढ़ पाते हैं अधिकांश अभिभावक बच्चों के साथ मनमानी करते हैं और हम पर हमेशा ही पढ़ाई का दबाव बनाए रखते हैं इसका नतीजा यह होता है कि उनका पढ़ाई से सदा के लिए मन उचट जाता है और वह बाद में चाह कर भी पढ़ाई से जुड़ नहीं पाते हैं यानी पढ़ना लिखना उन्हें अच्छा नहीं लगता हैं !

कहने का तात्पर्य है कि बच्चा जो काम करना चाहता है उसे पहले वही काम करने दीजिए और खेलना चाहता है तो चलने दो आराम करना चाहता है या कार्टून देखना चाहता है तो आप मना ना करें मन दस बीस नहीं एक ही होता है ! बच्चा एक समय में एक ही काम कर सकता है हां वह खेल के प्रति इतनी रुचि क्यों लगता है और पढ़ाई से क्यों जी चुराता है ! इसका कारण जरुर ही ढूंढे पढ़ाई से लगभग सभी बच्चे कतराते हैं और जी भी चुराते हैं !

पढ़ाई जीवन के लिए कितना जरूरी है उन्हें इसका बोध समय-समय पर कराते रहने से वह पढ़ाई से दिल से जुड़ते हैं ! बच्चा कभी आपके पास बैठना चाहता है या कहानी सुनने की जिद कर रहा है तो आप भूलकर भी ना कहें कि जाकर अपनी पढ़ाई करो इससे बच्चा जाने अनजाने में आप के प्रति कठोर हो जाता है ! कठोरता बच्चों के भविष्य के लिए कतई ठीक नहीं है वह कहानी सुनना चाहता हों तो बाल कहानी उसे सुनाइए वह आपसे बात करना चाहता है तो उससे खुलकर बात कीज़िये ! इससे बच्चों के साथ आपकी मित्रता हो जाएगी फिर वह आपकी हर बात मानने लगेगा और आप पढ़ने के लिए कहते हैं तो झठ से पढ़ने बैठ जाता है ! पढ़ाई बच्चों के लिए एक ऊबाऊँ हैं ! आप उन पर इसके लिए दबाव बनाने का प्रयास करेंगे तो हो सकता है पढ़ाई बोझ लगने लगे पढ़ाई के लिए उन्हें सीढी दर सीढी तैयार करें और मैं जैसे तैसे समझ आती जाएगी तो वैसे वैसे पढ़ाई से भी जुड़ते जाएंगे ! अगर आप बच्चों के मन को समझने में कामयाब हो गए तो यकीन मानिए बच्चा खुद-ब-खुद आपकी हर बात मान लेगा और आपको अपनी हर बात बच्चे से मनवाने के लिए डांट डपट का सहारा भी नहीं लेना पड़ेगा !

           #रुपेश कुमार

परिचय : चैनपुर ज़िला सीवान (बिहार) निवासी रुपेश कुमार भौतिकी में स्नाकोतर हैं। आप डिप्लोमा सहित एडीसीए में प्रतियोगी छात्र एव युवा लेखक के तौर पर सक्रिय हैं। १९९१ में जन्मे रुपेश कुमार पढ़ाई के साथ सहित्य और विज्ञान सम्बन्धी पत्र-पत्रिकाओं में लेखन करते हैं। कुछ संस्थाओं द्वारा आपको सम्मानित भी किया गया है।

Arpan Jain

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।